ओपेनहाइमर की असली कहानी: नायक या खलनायक?
"अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, दुनिया का विनाशक।"
नमस्कार दोस्तों! 16 जुलाई 1945, सुबह के लगभग 5:30 बज रहे थे। अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य के रेगिस्तान में एक भयानक बम फटता है। लेकिन यह कोई साधारण बम धमाका नहीं था; यह इतिहास में पहली बार हो रहा एक परमाणु बम (Nuclear Bomb) का परीक्षण था। 5, 4, 3, 2, 1...बूम। इस परमाणु परीक्षण को 'ट्रिनिटी' (Trinity) कोडनेम दिया गया था और इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व वैज्ञानिक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर कर रहे थे।
इस धमाके को देखकर ओपेनहाइमर खुद सन्न रह गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि धमाके की ताकत लगभग 0.3 किलोटन TNT के बराबर होगी, लेकिन असल में यह धमाका 50 गुना ज्यादा खतरनाक था—लगभग 15-20 किलोटन TNT के बराबर। इस विस्फोट से इतनी भयंकर गर्मी पैदा हुई कि वह विशाल स्टील टॉवर भाप बनकर उड़ गया। इसकी शॉकवेव (झटके) 160 किलोमीटर दूर तक महसूस की गई और जो मशरूम क्लाउड (धुएं का गुबार) उठा, वह आसमान में 12 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया।
यह सब देखकर ओपेनहाइमर इतने स्तब्ध रह गए कि उनके मुंह से भगवत गीता की एक पंक्ति निकल पड़ी: "अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, दुनिया का विनाशक।"
आप सोच रहे होंगे कि ओपेनहाइमर को भगवत गीता के बारे में कैसे पता था? हम आर्टिकल के इस हिस्से पर आगे बात करेंगे। चूंकि क्रिस्टोफर नोलन ने हाल ही में उन पर एक फिल्म बनाई है, इसलिए यह उनके जीवन की कहानी, परमाणु बम के विकास, और यह समझने का सही अवसर है कि ओपेनहाइमर एक नायक (Hero) थे या खलनायक (Villain)। अपनी ही बनाई चीज़ से लाखों लोगों की जान जाने पर उन्हें कैसा महसूस हुआ? आइए जानते हैं।
एक 'चाइल्ड जीनियस' का बचपन और शिक्षा
जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर को परमाणु बम का जनक (Father of the Atomic Bomb) कहा जाता है। वह 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' के डायरेक्टर थे, जिसने दुनिया के पहले परमाणु हथियार बनाए।
उनका जन्म 1904 में न्यूयॉर्क शहर के एक जर्मन-यहूदी (German-Jewish) परिवार में हुआ था। उन्हें बचपन से ही एक प्रतिभाशाली बच्चा (Child Genius) माना जाता था। मात्र 10 साल की उम्र में वह हाई-लेवल फिजिक्स और केमिस्ट्री पढ़ रहे थे। मिनरलॉजी (खनिज विज्ञान) और खनिजों के गुणों के बारे में उनका ज्ञान इतना गहरा था कि 12 साल की उम्र में उन्हें न्यूयॉर्क के मिनरलॉजिकल क्लब में लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया गया था。
बाद में 1922 में, जब वे हार्वर्ड (Harvard) में पढ़ने गए, तो उन्होंने अपनी 4 साल की डिग्री महज़ 3 साल में पूरी कर ली। वे अपनी क्लास में टॉपर थे। उन्होंने केमिस्ट्री में मेजर किया था, लेकिन उन्हें फिजिक्स, फिलॉसफी (दर्शनशास्त्र), साहित्य और यहाँ तक कि पूर्वी धर्मों (Eastern religions) का भी गहरा ज्ञान था। हार्वर्ड में उन्हें एहसास हुआ कि इन सभी विषयों में उनका असली जुनून 'फिजिक्स' है। 1927 में, 23 साल की कम उम्र में उन्होंने अपनी पीएचडी (PhD) पूरी कर ली।
जीनियस के पीछे का छिपा हुआ अंधकार
इस असाधारण प्रतिभा के पीछे एक डार्क साइड भी छिपी थी। उनके दोस्तों का कहना था कि ओपेनहाइमर में खुद को नुकसान पहुँचाने (self-destructive) की प्रवृत्ति थी। वह एक चेन स्मोकर थे और डिप्रेशन से जूझ रहे थे। एक दिन उन्होंने अपने भाई से कहा, "मुझे दोस्तों से ज्यादा फिजिक्स की जरूरत है।"
वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित रखते थे और दुनिया में क्या हो रहा है, इससे पूरी तरह अनजान थे। यह सिलसिला 1930 के दशक की शुरुआत तक चला, जब जर्मनी में एडोल्फ हिटलर का उदय हुआ।
राजनीति और विश्व युद्ध की शुरुआत
हिटलर के अत्याचारों के कारण कई जर्मन वैज्ञानिक जर्मनी से भागकर अमेरिका आ रहे थे। इस सूची में कई बड़े नाम शामिल थे:
- अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein)
- जॉन वॉन न्यूमैन (John von Neumann): जिन्होंने आधुनिक कंप्यूटर की नींव रखी।
- लियो जिलार्ड (Leo Szilard): जो हमारी कहानी में अहम भूमिका निभाएंगे।
- हंस बेथे (Hans Bethe): जिन्होंने तारों में होने वाले फ्यूजन (fusion) की खोज की।
- एडवर्ड टेलर (Edward Teller): जिन्हें हाइड्रोजन बम का जनक कहा जाता है।
- एनरिको फर्मी (Enrico Fermi): जो इस कहानी का एक और अहम हिस्सा हैं।
ये सभी वैज्ञानिक मुख्य रूप से जर्मन-यहूदी थे। क्योंकि ओपेनहाइमर खुद एक जर्मन-यहूदी परिवार से आते थे, जब उन्होंने यहूदियों पर हो रहे अत्याचारों पर ध्यान देना शुरू किया, तो राजनीति में उनकी दिलचस्पी जागी। 1936 में उन्होंने कहा था: "मैंने यह समझना शुरू किया कि राजनीतिक और आर्थिक घटनाएँ लोगों के जीवन को कितनी गहराई से प्रभावित करती हैं। मुझे इस समुदाय में हिस्सा लेने की ज़रूरत महसूस हुई।"
वामपंथी (Left-wing) विचारधारा से प्रभावित होकर, वह कई राजनीतिक बैठकों में गए और मज़दूर संघों (Labour Unions) और हड़ताल कर रहे खेत मज़दूरों को पैसे दान किए।
सितंबर 1939 में, हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया, जो द्वितीय विश्व युद्ध (World War 2) की शुरुआत थी। शुरुआत में अमेरिका इस युद्ध में शामिल होने का इच्छुक नहीं था, लेकिन वह सबसे बुरे हालात के लिए तैयारी कर रहा था।
आइंस्टीन की चिट्ठी और सीक्रेट मिशन
युद्ध शुरू होने से एक महीने पहले, अगस्त 1939 में, अल्बर्ट आइंस्टीन और लियो जिलार्ड ने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने चेतावनी दी कि हिटलर परमाणु हथियारों पर काम कर रहा है और वह एक बेहद शक्तिशाली बम बनाने में सफल हो सकता है, इसलिए अमेरिका को तैयार रहना चाहिए।
पत्र पढ़ते ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने तुरंत कार्रवाई करते हुए यूरेनियम पर एक सलाहकार समिति का गठन किया। वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों की एक टीम बनाई गई जिसका काम यूरेनियम की क्षमता पर शोध करना था—क्या यूरेनियम से हथियार बन सकता है? समिति की रिपोर्ट के बाद, अमेरिकी सरकार ने एनरिको फर्मी और लियो जिलार्ड को फण्ड देना शुरू किया ताकि वे समझ सकें कि 'न्यूक्लियर चेन रिएक्शन' (परमाणु श्रृंखला प्रतिक्रिया) कैसे काम करती है और यूरेनियम के समस्थानिकों (isotopes) को कैसे अलग किया जाए।
विज्ञान की चुनौती: पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला यूरेनियम U-238 आइसोटोप होता है। इसमें 1% से भी कम हिस्सा U-235 आइसोटोप का होता है, और केवल इसी U-235 का इस्तेमाल बम बनाने में किया जा सकता था। वैज्ञानिकों के लिए पहली चुनौती U-238 का उपयोग करके U-235 बनाने का तरीका खोजना था。
दिलचस्प बात यह है कि इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिकों को हिदायत दी गई थी कि वे अल्बर्ट आइंस्टीन को कुछ न बताएं। अमेरिकी सरकार को डर था कि आइंस्टीन की वामपंथी (left-wing) विचारधारा सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है।
द मैनहट्टन प्रोजेक्ट (The Manhattan Project)
दिसंबर 1940 में, ओपेनहाइमर, एडवर्ड टेलर और अन्य वैज्ञानिकों के साथ परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) पर स्वतंत्र शोध कर रहे थे। उसी समय 'प्लूटोनियम' (Plutonium) नामक एक और रेडियोएक्टिव तत्व की खोज हुई, जिसके बारे में वैज्ञानिकों का मानना था कि इससे भी परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं।
11 अक्टूबर 1941 को अमेरिकी राष्ट्रपति ने ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को परमाणु विकास में सहयोग के लिए संदेश भेजा। इसके दो महीने बाद ही, 7 दिसंबर 1941 को जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला कर दिया और अमेरिका आधिकारिक तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध में कूद पड़ा।
अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि परमाणु हथियार बनाने का यह वैज्ञानिक मिशन एक सैन्य (Military) मिशन बन चुका है। अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट पर उस समय $2.2 बिलियन खर्च किए (जो आज की महंगाई के हिसाब से $24 बिलियन यानी लगभग 2 लाख करोड़ भारतीय रुपये के बराबर है)।
अमेरिकी सेना की इंजीनियरिंग विंग (Army Corps of Engineers) का मुख्यालय न्यूयॉर्क सिटी के मैनहट्टन में 18वीं मंजिल पर था। इसी वजह से 13 अगस्त 1942 को जब यह प्रोजेक्ट आधिकारिक रूप से शुरू हुआ, तो इसका नाम 'मैनहट्टन इंजीनियर डिस्ट्रिक्ट' रखा गया। 17 सितंबर को कर्नल लेस्ली रिचर्ड ग्रोव्स को इस प्रोजेक्ट का प्रमुख नियुक्त किया गया, और उन्होंने एटम बम डिज़ाइन का नेतृत्व ओपेनहाइमर को सौंपने का बड़ा फैसला लिया।
तीन गुप्त शहर और परमाणु डिज़ाइन
इस महा-परियोजना को दुनिया से छिपाने के लिए अलग-अलग गुप्त स्थान बनाए गए:
- ओक रिज, टेनेसी (The Secret City): यहाँ पूरा एक शहर सिर्फ इस प्रोजेक्ट के लिए बसाया गया। हजारों वैज्ञानिकों और मज़दूरों का एक ही काम था— यूरेनियम-238 से यूरेनियम-235 बनाना। इसके लिए मुख्य रूप से दो तकनीकें सफल रहीं:
- इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सेपरेशन (जहां एक बड़े चुंबक से U-235 को अलग किया जाता था)।
- गैसियस डिफ्यूजन (जहां यूरेनियम-हेक्साफ्लोराइड गैस को एक झिल्ली से गुज़ारा जाता था)।
- वाशिंगटन: यहाँ वैज्ञानिक प्लूटोनियम बनाने का काम कर रहे थे। बाद में पता चला कि प्लूटोनियम, यूरेनियम-235 की तुलना में अधिक रेडियोएक्टिव और विखंडनीय (fissionable) है।
- प्रोजेक्ट Y (लॉस एलामोस, न्यू मैक्सिको): यह वह जगह थी जहां बम को असल में डिज़ाइन किया जाना था। ओपेनहाइमर ने खुद न्यू मैक्सिको की पेकोस घाटी का सुझाव दिया था क्योंकि उन्होंने अपनी गर्मियां वहीं बिताई थीं।
2 दिसंबर 1942 को वैज्ञानिक एनरिको फर्मी ने शिकागो विश्वविद्यालय के एक स्क्वैश कोर्ट में पहली सफल 'चेन रिएक्शन' का व्यावहारिक प्रयोग किया, जिससे एक बल्ब जला। इससे साबित हो गया कि परमाणु बम बनाना संभव है।
जनरल ग्रोव्स ओपेनहाइमर की क्षमता से इतने प्रभावित थे कि सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों के विरोध के बावजूद (क्योंकि ओपेनहाइमर के परिवार और दोस्तों के कम्युनिस्ट/वामपंथी झुकाव थे), उन्होंने 20 जुलाई 1943 को ओपेनहाइमर को प्रोजेक्ट का मुख्य निदेशक (Lead) बना दिया।
लिटिल बॉय (Little Boy) और फैट मैन (Fat Man)
ओपेनहाइमर की विशेषज्ञता 'क्रिटिकल मास' (Critical Mass - वो न्यूनतम द्रव्यमान जो चेन रिएक्शन शुरू करने के लिए जरूरी है) की गणना करने में थी। अमेरिका एक साथ दो तरह के बम विकसित कर रहा था:
- लिटिल बॉय (Little Boy): यह यूरेनियम-235 पर आधारित था। यह एक "गन-टाइप" डिज़ाइन था। इसमें यूरेनियम के दो सब-क्रिटिकल (क्रिटिकल से कम) टुकड़ों को तेज़ी से एक दूसरे से टकराया जाता था, जिससे क्रिटिकल मास पूरा हो जाए और धमाका हो।
- फैट मैन (Fat Man): यह प्लूटोनियम-239 से बना था। इसे डिज़ाइन करना ज्यादा मुश्किल था क्योंकि प्लूटोनियम इतनी तेज़ी से रिएक्ट करता है कि गन-टाइप डिज़ाइन में वह फटने से पहले ही पिघल जाता। इसलिए वैज्ञानिकों ने 'इम्प्लोजन मेथड' (Implosion Method - अंतःस्फोट) का इस्तेमाल किया। इसमें प्लूटोनियम के गोले के बाहर विस्फोटकों की एक परत लगाई गई, जो बाहर से अंदर की तरफ (implode) दबाव डालती थी, जिससे प्लूटोनियम सिकुड़कर क्रिटिकल मास तक पहुंच जाता और भयानक विस्फोट होता।
ट्रिनिटी परीक्षण और विनाश का तांडव
ओपेनहाइमर इस प्लूटोनियम बम (इम्प्लोजन मेथड) का परीक्षण करना चाहते थे। कर्नल ग्रोव्स शुरुआत में राज़ी नहीं थे क्योंकि प्लूटोनियम बहुत कम मात्रा में था, लेकिन अंततः उन्हें मानना पड़ा।
16 जुलाई 1945 को न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में 'गैजेट' (Gadget) नामक टेस्ट बम का धमाका किया गया। इसमें 13 पाउंड प्लूटोनियम था जिसे 100 फ़ीट ऊंचे स्टील टॉवर पर लटकाया गया था। यह धमाका ओपेनहाइमर की सोच से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली था। टॉवर भाप बन गया और धमाके के बाद वहां मौजूद रेत पिघलकर एक हल्के रेडियोएक्टिव हरे कांच में बदल गई, जिसे 'ट्रिनिटाइट' (Trinitite) नाम दिया गया। इसी दृश्य को देखकर ओपेनहाइमर ने गीता के वे श्लोक याद किए थे: "अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, दुनिया का विनाशक।" ओपेनहाइमर वास्तव में संस्कृत के विद्वान थे और उन्होंने भगवद गीता को उसके मूल रूप में पढ़ा था। वह इसे अपने जीवन की सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में से एक मानते थे।
हिरोशिमा, नागासाकी और ओपेनहाइमर का पश्चाताप
ट्रिनिटी टेस्ट के एक महीने से भी कम समय के बाद, 6 अगस्त 1945 को 'लिटिल बॉय' को हिरोशिमा (Hiroshima) पर गिराया गया। तीन दिन बाद, 9 अगस्त को 'फैट मैन' नागासाकी (Nagasaki) पर गिराया गया。
यह खबर सुनकर अल्बर्ट आइंस्टीन की पहली प्रतिक्रिया भारी दुःख से भरी थी: "मुझ पर धिक्कार है (Woe is me)।" माना जाता है कि आइंस्टीन ने यह भी कहा था, "मानव जाति ने परमाणु बम का आविष्कार किया, लेकिन कोई चूहा कभी चूहेदानी (mousetrap) नहीं बनाएगा।"
शुरुआत में, हिरोशिमा पर बम गिरने के बाद ओपेनहाइमर ने खुशी ज़ाहिर की थी। वह चाहते थे कि इस बम का इस्तेमाल नाज़ी जर्मनी और हिटलर के ख़िलाफ़ हो। इसे वह एक 'ज़रूरी बुराई' (necessary evil) मानते थे। लेकिन नागासाकी पर हुए हमले ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।
17 अगस्त को, ओपेनहाइमर अमेरिका के युद्ध सचिव (Secretary of War) से मिलने वाशिंगटन गए और एक पत्र सौंपा जिसमें उन्होंने परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उन्हें उस तकनीक को इंसानों के हाथ में सौंपने का गहरा पछतावा था।
अक्टूबर 1945 में (राष्ट्रपति रूजवेल्ट के निधन के बाद), ओपेनहाइमर को नए अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (Harry Truman) से मिलने का मौका मिला। राष्ट्रपति से मिलते ही उन्होंने सीधे कहा, "मेरे हाथों पर खून लगा है (I have blood on my hands)।" यह सुनकर राष्ट्रपति ट्रूमैन इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने ओपेनहाइमर पर चिल्लाना शुरू कर दिया और अपने सचिव से कहा कि इसे तुरंत दफ्तर से बाहर निकालो और वह इसका चेहरा दोबारा कभी नहीं देखना चाहते।
अंतिम वर्ष: एक नायक जो व्यवस्था का शिकार हुआ
ओपेनहाइमर ने बाद में 'अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग' (US Atomic Energy Commission) के साथ मिलकर परमाणु हथियारों पर नियंत्रण स्थापित करने और आगे ऐसे हमलों को रोकने के लिए काम किया। 1949 में जब राष्ट्रपति ट्रूमैन ने 'हाइड्रोजन बम' बनाने का प्रस्ताव रखा, तो ओपेनहाइमर ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। 1952 में अमेरिका ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर लिया (जिसमें एडवर्ड टेलर ने मदद की थी)।
ओपेनहाइमर के लगातार विरोध और उनकी वामपंथी विचारधारा के इतिहास के कारण, सरकार ने उनके सिक्योरिटी क्लीयरेंस रद्द कर दिए और उनसे उनकी नौकरी छीन ली गई। उन्होंने अपना बाकी जीवन एक शिक्षाविद (academic) के रूप में बिताया और पूरी दुनिया में लेक्चर दिए। हालांकि उन्हें तीन बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन वह एक बार भी जीत नहीं सके।
1965 में, 62 वर्ष की आयु में गले के कैंसर के कारण ओपेनहाइमर का निधन हो गया। यह आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि वह जीवन भर भारी चेन-स्मोकिंग करते थे।
आज दुनिया के 9 देशों (भारत, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, फ्रांस, यूके, इज़राइल, रूस और उत्तर कोरिया) के पास परमाणु हथियार हैं। लेकिन सबसे सकारात्मक बात यह है कि पिछले 80 वर्षों में, उस विनाशकारी दिन के बाद से दोबारा कभी किसी परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
