Skip to content
UpShiksha
Loading editorial updates...

क्षेत्रीय दल और लोकतंत्र: भारतीय संघवाद, परिसीमन और क्षेत्रीय राजनीति का विश्लेषण

क्षेत्रीय दल और लोकतंत्र: भारतीय संघवाद, परिसीमन और क्षेत्रीय राजनीति का विश्लेषण
क्षेत्रीय दल और लोकतंत्र | भारतीय संघवाद, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक गहराई

क्षेत्रीय दल और लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र के नेहरूवादी चरण में, देश अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से बाहर निकला था और अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा था। स्वतंत्रता की खुशी के साथ विभाजन की त्रासदी और महात्मा गांधी की हत्या भी हुई। लाखों लोग विस्थापित हुए, समुदाय बिखर गए और एकीकृत भारत की अवधारणा स्वयं नाजुक प्रतीत होने लगी।

इन विशाल चुनौतियों के बावजूद भारत अराजकता में नहीं डूबा। इसके विपरीत, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य के निर्माण का उल्लेखनीय सामूहिक संकल्प सामने आया। इसका अर्थ यह नहीं है कि नेहरू युग तनावों से मुक्त था। देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक हलचलें पहले से दिखाई दे रही थीं। उदाहरण के लिए, भाषाई राज्यों की मांग सांस्कृतिक पहचानों के सशक्त दावे का प्रतीक थी। फिर भी नेहरू का राजनीतिक कद तथा संघवाद, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय एकीकरण पर उनका जोर इस भावना को मजबूत करता था कि भारत की परियोजना में सभी क्षेत्रों की समान हिस्सेदारी है।

जैसे-जैसे भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं विकसित और परिपक्व होती गईं, प्रारंभिक वर्षों की व्यापक राष्ट्रीय सहमति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। कांग्रेस प्रणाली क्षेत्रीय आकांक्षाओं के पूरे दायरे का प्रतिनिधित्व करने की अपनी क्षमता खोने लगी। इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दल प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरे। यह लोकतंत्र की गहराई बढ़ने का संकेत था। इन दलों ने उन आवाजों और चिंताओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति दी, जो अक्सर राष्ट्रीय राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं पा रही थीं। वे विशिष्ट ऐतिहासिक, भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुए और स्थानीय वास्तविकताओं में निहित आकांक्षाओं को व्यक्त करने का प्रयास करने लगे।

तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन ने हिंदीभाषी उत्तर के कथित सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती दी। जो आंदोलन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में शुरू हुआ था, वह अंततः एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गया। पंजाब में क्षेत्रीय राजनीति भाषा, धर्म और संघीय स्वायत्तता से जुड़ी चिंताओं को प्रतिबिंबित करती थी। असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में क्षेत्रीय दल उन आंदोलनों से उभरे जो स्थानीय पहचानों की मान्यता और संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की मांग कर रहे थे। जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों ने स्थानीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय एकीकरण के बीच जटिल संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय दल विशिष्ट राजनीतिक तथा विकासात्मक चिंताओं को व्यक्त करने के माध्यम बने।

संभवतः क्षेत्रीय दलों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय संघवाद को मजबूत करने में उनकी भूमिका रही है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि एकता को केवल केंद्रीकरण से नहीं, बल्कि समायोजन, संवाद और बातचीत के माध्यम से भी मजबूत बनाया जा सकता है।

1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुआ गठबंधन युग और उसके बाद के लगभग तीन दशकों ने क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव के चरम को चिह्नित किया। केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर निर्भर थीं। राज्यों को अधिक सौदेबाजी की शक्ति प्राप्त हुई, क्षेत्रीय चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और संघीय सिद्धांत अधिक सार्थक बन गया। यह राजनीतिक मजबूरी तब कम हो गई जब भारतीय जनता पार्टी ने 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया, हालांकि शासन व्यवस्था गठबंधनों के माध्यम से चलती रही।

कुछ पर्यवेक्षक क्षेत्रीय दलों के क्रमिक पतन की भविष्यवाणी करते हैं, लेकिन ऐसी भविष्यवाणियां समय से पहले की प्रतीत होती हैं। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक विविधताओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। जब तक ये विविधताएं मौजूद हैं, तब तक वे राजनीतिक शक्तियां भी प्रासंगिक बनी रहेंगी जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती हैं।

यह सत्य है कि कुछ स्थानों पर क्षेत्रीयतावाद संकीर्ण या मूलनिवासी राजनीति में बदल गया है। फिर भी व्यापक ऐतिहासिक अनुभव बताता है कि क्षेत्रीय दलों ने प्रतिनिधित्व का विस्तार किया है, स्थापित अभिजात वर्ग को चुनौती दी है और ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का कार्य किया है।

समकालीन राजनीतिक परिदृश्य नई चुनौतियां प्रस्तुत करता है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी परीक्षा परिसीमन की प्रक्रिया है। लोकसभा की सीटें लंबे समय से 1971 की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित हैं। दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि यदि जनसंख्या के आधार पर पुनर्वितरण किया गया तो राजनीतिक शक्ति का संतुलन उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाएगा और उनका प्रभाव कम हो जाएगा।

भारत पारंपरिक यूरोपीय अर्थों में केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं है। यह अनेक पहचानों, भाषाओं, संस्कृतियों और इतिहासों के बीच एक सभ्यतागत समझौता भी है। क्षेत्रीय दल हमें इसी वास्तविकता की याद दिलाते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि केंद्र और राज्यों के बीच संवाद जीवित रहे।

आज की चुनौती राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में से किसी एक को चुनने की नहीं है, न ही उन्हें एक-दूसरे के विरोधी ध्रुवों के रूप में देखने की है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में लोकतंत्र की जीवंतता सदैव इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्रीय कल्पना क्षेत्रीय आकांक्षाओं को किस सीमा तक समायोजित कर पाती है।

इसी अर्थ में, क्षेत्रीय दलों का भविष्य भारत की अवधारणा (Idea of India) के भविष्य से अविभाज्य है।

UPTeacherNews

UPTeacherNews

Senior Editor & Content Specialist at UpShiksha. Follow for premium editorial updates, in-depth analysis, and exclusive educational study resources.

📑 On This Page
FB X WA Copy