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Chapter 3: 1857 के बाद किसान आंदोलन और किसान विद्रोह
1857 की क्रांति के बाद, भारत में किसानों के संघर्ष का चरित्र बदल गया था। इस दौरान किसान सीधे जमींदारों, साहूकारों और ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ संगठित हुए।
यहाँ 1857 के बाद (1859 से 1947 तक) के प्रमुख किसान आंदोलनों और विद्रोहों की पूरी सूची दी गई है:
1. प्रारंभिक चरण के किसान आंदोलन (1859–1900)
यह वह दौर था जब आंदोलन स्थानीय मुद्दों जैसे लगान वृद्धि, साहूकारों के शोषण और जबरन खेती के खिलाफ केंद्रित थे।
- नील विद्रोह (1859-60): बंगाल (नादिया जिला) में यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा जबरन नील की खेती कराने के विरोध में हुआ। इसके प्रमुख नेता दिगंबर विश्वास और विष्णु विश्वास थे।
- पावना विद्रोह (1873-76): पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के पावना में जमींदारों द्वारा अत्यधिक लगान वसूली और बेदखली के खिलाफ। इसके प्रमुख नेता ईशान चंद्र राय और शंभू पाल थे।
- दक्कन विद्रोह (1875): महाराष्ट्र (पुणे, अहमदनगर) के क्षेत्रों में गुजराती और मारवाड़ी साहूकारों के खिलाफ किसानों का हिंसक विद्रोह। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने दक्कन कृषक राहत अधिनियम (1879) पारित किया।
- मोपला (माप्पिला) विद्रोह - प्रारंभिक चरण (1836-1896): केरल के मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम किसानों (मोपला) द्वारा हिंदू जमींदारों और ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह।
2. 20वीं शताब्दी के राष्ट्रवादी चरण के आंदोलन (1901–1930)
इस चरण में किसान आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (विशेषकर महात्मा गांधी और राष्ट्रीय कांग्रेस) के साथ जुड़ गए।
- चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार के चंपारण में महात्मा गांधी के नेतृत्व में 'तिनकटिया प्रथा' (जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती) के खिलाफ सफल आंदोलन।
- खेड़ा सत्याग्रह (1918): गुजरात के खेड़ा जिले में फसल नष्ट होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार द्वारा जबरन टैक्स वसूलने के खिलाफ। नेतृत्व महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया।
- किसान सभा आंदोलन (1918-1921): उत्तर प्रदेश (अवध क्षेत्र) में जमींदारों के अत्याचार, बेदखली और अवैध टैक्सों के खिलाफ। इसके प्रमुख संगठनकर्ता बाबा रामचंद्र, गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी थे।
- एका आंदोलन (1921-22): उत्तर प्रदेश (हरदोई, बहराइच, सीतापुर) में निर्धारित लगान से अधिक वसूली के विरोध में। इसका नेतृत्व मुख्य रूप से पिछड़ी जाति के नेता मदारी पासी ने किया था।
- मोपला विद्रोह - दूसरा चरण (1921): केरल (मालाबार) में असहयोग आंदोलन के दौरान यह विद्रोह बेहद हिंसक हो गया। इसके मुख्य नेता अली मुसलियार थे।
- बारडोली सत्याग्रह (1928): गुजरात (सूरत जिला) में प्रांतीय सरकार द्वारा लगान में 22% की बढ़ोतरी के खिलाफ सफल आंदोलन। इसका कुशल नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया, जहाँ इन्हें 'सरदार' की उपाधि मिली।
3. वामपंथी एवं अखिल भारतीय चरण (1930–1947)
इस चरण में किसान आंदोलनों पर वामपंथी और कम्युनिस्ट विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा और किसान देश स्तर पर संगठित हुए।
- अखिल भारतीय किसान सभा (1936): लखनऊ में स्वामी सहजानंद सरस्वती (अध्यक्ष) और एन.जी. रंगा (महासचिव) द्वारा देश के सबसे बड़े किसान संगठन की स्थापना की गई।
- बकाश्त भूमि आंदोलन (1937-39): बिहार में जमींदारों द्वारा कब्जा की गई किसानों की मूल भूमि (बकाश्त भूमि) को वापस पाने के लिए स्वामी सहजानंद सरस्वती और कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में संघर्ष हुआ।
- तेभागा आंदोलन (1946-47): बंगाल में बटाईदार किसानों (बर्गदारों) द्वारा फसल का 2/3 हिस्सा अपने पास रखने की मांग को लेकर किया गया विशाल आंदोलन। इसका नेतृत्व प्रांतीय किसान सभा ने किया था।
- तेलंगाना किसान आंदोलन (1946-51): हैदराबाद रियासत (वर्तमान तेलंगाना) में जमींदारों (देशमुखों) और निजाम के निरंकुश शासन के खिलाफ कम्युनिस्टों के नेतृत्व में किया गया भारत का सबसे बड़ा हिंसक छापामार किसान विद्रोह।
नील विद्रोह (1859-60)
1. समाचार पत्र और उनके ऐतिहासिक संपादकीय (Newspapers & Editorials)
- द हिन्दू पैट्रियट (The Hindoo Patriot):
संपादक: हरीश चंद्र मुखर्जी。
संपादकीय नीति: इसने नील किसानों के अधिकारों के लिए एक कानूनी और बौद्धिक लड़ाई लड़ी। मुखर्जी ने अपने संपादकीय में लिखा था कि बागान मालिकों की व्यवस्था "रक्त और आंसू की प्रणाली" (System of blood and tears) है।
महत्वपूर्ण लेख: 1860 के एक प्रसिद्ध संपादकीय में उन्होंने लिखा:"बंगाल के किसान अपने प्राण दे सकते हैं, लेकिन वे अब और नील नहीं उगाएंगे। वे कोड़ों की मार सह सकते हैं, जेल जा सकते हैं, पर गुलामी की इस खेती को स्वीकार नहीं करेंगे।"
- सोम प्रकाश (Som Prakash):
संपादक: द्वारकानाथ विद्याभूषण (ईश्वर चंद्र विद्यासागर के सहयोग से)।
योगदान: यह पहला बंगाली राजनीतिक साप्ताहिक पत्र था। इसने ग्रामीण इलाकों से सीधे रिपोर्ट प्रकाशित की कि कैसे बागान मालिक 'ददन' (अग्रिम राशि) के जाल में किसानों को फंसाते थे। - ग्रामवार्ता प्रकाशिका (Grambartha Prakashika):
संपादक: हरिनाठ मजूमदार (कंगाल हरिनाठ)।
योगदान: कुश्तिया (अब बांग्लादेश) से प्रकाशित इस पत्र ने जमींदारों, बागान मालिकों और पुलिस के त्रिकोण (Nexus) का पर्दाफाश किया। - तत्वबोधिनी पत्रिका (Tattvabodhini Patrika):
योगदान: देवेंद्रनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में इस पत्रिका ने इस बात पर जोर दिया कि नील की खेती ने बंगाल की उपजाऊ खाद्य फसलों (धान) की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
2. विचारक, लेखक और उनके विचार (Thinkers & Key Thoughts)
- दीनबंधु मित्र (Dinabandhu Mitra):
विचार/कृति: उनके नाटक 'नील दर्पण' (1859) ने इस आंदोलन को वैचारिक धार दी। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक समृद्ध किसान परिवार (गोलोक बसु का परिवार) नील बागान मालिकों के अत्याचार के कारण पूरी तरह तबाह हो जाता है। - बंकिम चंद्र चटर्जी (Bankim Chandra Chatterjee):
विचार: उन्होंने नील दर्पण की तुलना अमेरिका के प्रसिद्ध दास-विरोधी उपन्यास 'अंकल टॉम्स केबिन' (Uncle Tom's Cabin) से की। उनका मानना था कि नील दर्पण ने बंगाली समाज में वही चेतना जगाई जो 'अंकल टॉम्स केबिन' ने अमेरिका में अश्वेतों की गुलामी के खिलाफ जगाई थी। - माइकल मधुसूदन दत्त (Michael Madhusudan Dutt):
विचार/योगदान: इन्होंने गुप्त रूप से इस नाटक का अंग्रेजी अनुवाद 'Nil Darpan; or, The Indigo Planting Mirror' नाम से किया। उनका विचार था कि इस क्रूरता को अंतरराष्ट्रीय और ब्रिटिश संसद के स्तर पर उजागर किया जाना चाहिए। - रेवरेंड जेम्स लॉन्ग (Rev. James Long):
विचार: एक एंग्लिकन पादरी होने के नाते, उन्होंने ब्रिटिश शासन की इस क्रूरता को 'ईसाई मूल्यों के खिलाफ' माना। उन्होंने इस अनुवादित पुस्तक की प्रस्तावना लिखी और इसे सरकारी डाक से इंग्लैंड भेजा, जिसके कारण उन्हें एक महीने की जेल और 1000 रुपये का जुर्माना भुगतना पड़ा (यह जुर्माना बाद में प्रसिद्ध कालीप्रसन्न सिंह ने अदालत में भरा था)। - सिसिर कुमार घोष (Sisir Kumar Ghosh):
विचार: (बाद में अमृत बाजार पत्रिका के संस्थापक) उन्होंने इस विद्रोह को "बंगाल में राजनीतिक आंदोलन का पहला पाठ" कहा। उनका विचार था कि इस विद्रोह ने पहली बार भारतीयों को संगठित होकर शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) की शक्ति सिखाई।
3. विगत वर्षों के परीक्षा प्रश्न (PYQs)
पावना (पबना) किसान विद्रोह (1873-1876)
आधुनिक भारत के इतिहास में एक अनूठा और अत्यंत महत्वपूर्ण आंदोलन है।
1. विद्रोह का मुख्य चरित्र और वैचारिक आधार
यह आंदोलन अन्य हिंसक विद्रोहों से भिन्न था क्योंकि यह पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक दायरे में लड़ा गया था。
- नारा: किसानों का सबसे प्रसिद्ध नारा था:
"हम महारानी (क्वीन विक्टोरिया) और केवल उन्हीं के रैयत (किरायेदार) होना चाहते हैं।"
(यानी किसान ब्रिटिश शासन के नहीं, बल्कि स्थानीय जमींदारों के अवैध शोषण के विरोधी थे)। - कृषि लीग (Agrarian League): 1873 में पाबना के यूसुफशाही परगना में पहली बार किसानों ने चंदा इकट्ठा करके एक 'लीग' बनाई ताकि जमींदारों के खिलाफ अदालतों में कानूनी लड़ाई लड़ी जा सके।
- कारण: जमींदारों द्वारा 1859 के 'अधिनियम X' (Act X) के तहत किसानों को मिलने वाले दखलअंदाजी अधिकार (Occupancy Rights) को रोकना और अवैध उपकर (अबवाब) वसूलना।
- प्रमुख नेता: ईशान चंद्र राय (इन्हें 'विद्रोही राजा' कहा जाता था), शंभू पाल और खुदी मुल्लाह।
2. संबंधित पत्र-पत्रिकाएं, समाचार पत्र और संपादकीय
इस विद्रोह को बंगाल के प्रबुद्ध और मध्यम वर्ग (Intelligentsia) का व्यापक समर्थन मिला।
- अमृत बाजार पत्रिका (Amrita Bazar Patrika):
संपादक: सिसिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष।
योगदान: इस अखबार ने किसानों की 'कृषि लीग' के गठन की सराहना की और इसे ग्रामीण भारत में "लोकतांत्रिक चेतना की शुरुआत" बताया। - द हिंदू पैट्रियट (The Hindoo Patriot):
योगदान: हालांकि इसने किसानों की दुर्दशा पर सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन जमींदारों के अधिकारों का भी एक सीमा तक बचाव किया (क्योंकि यह अखबार कुछ हद तक जमींदारी हितों से भी प्रभावित था)। - सुलभ समाचार (Sulabh Samachar):
योगदान: केशव चंद्र सेन के इस लोकप्रिय बंगाली पत्र ने जमींदारों के अत्याचारों की जमीनी कहानियों को बहुत आक्रामक तरीके से छापा।
3. प्रमुख विचारक और उनके विचार
- बंकिम चंद्र चटर्जी (Bankim Chandra Chatterjee):
विचार: उन्होंने अपने प्रसिद्ध निबंध 'बंगदेशेर कृषक' (Bengal Peasantry - 1892) में पाबना के किसानों का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि जमींदारों द्वारा किसानों का शोषण समाज के आर्थिक पतन का मुख्य कारण है। - रमेश चंद्र दत्त (R.C. Dutt):
विचार: प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आर.सी. दत्त ने पाबना आंदोलन को जायज ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक किसानों को भूमि का स्थाई स्वामित्व या सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक अकाल और भुखमरी को नहीं रोका जा सकता। - सुरेंद्रनाथ बनर्जी (Surendranath Banerjee):
योगदान: उन्होंने अपनी संस्था 'इंडियन एसोसिएशन' (1876) के माध्यम से किसानों की मांगों के पक्ष में रैलियां कीं। उन्होंने मध्यम वर्ग और कृषक वर्ग को एक मंच पर लाने का पहला सफल प्रयास किया। - सर जॉर्ज कैंपबेल (Sir George Campbell - तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर):
विचार: इन्होंने इस आंदोलन के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया और जमींदारों को केवल कानूनी सीमा में लगान वसूलने की चेतावनी दी, जिससे किसानों को नैतिक बल मिला।
4. विगत वर्षों के परीक्षा प्रश्न
(a) पावना आंदोलन
(b) मोपला विद्रोह
(c) दक्कन दंगे
(d) बारडोली सत्याग्रह
(i) महाराष्ट्र
(ii) पूर्वी बंगाल
(iii) गुजरात
(iv) मालाबार
1. पाबना विद्रोह का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकना था。
2. इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1885 में ब्रिटिश सरकार ने 'बंगाल किरायेदारी अधिनियम' (Bengal Tenancy Act) पारित किया।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सत्य है/हैं?
बंगाल के राष्ट्रवादियों का योगदान (1870-1880)
1870 और 1880 के दशकों में आनंद मोहन बोस, द्वारकानाथ गांगुली, और आर. सी. दत्त (R.C. Dutt) बंगाल के उन राष्ट्रवादियों में शामिल थे, जिन्होंने भारतीय किसान समस्याओं (विशेषकर पाबना विद्रोह और असम के चाय बागान मजदूरों के शोषण) को एक राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
1. विचारकों का वैचारिक योगदान और संगठन (Thinkers & Organizations)
- आनंद मोहन बोस (Ananda Mohan Bose)
वैचारिक दृष्टिकोण: वे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1898) भी रहे। उनका मानना था कि जब तक किसानों और आम जनता को राजनीतिक आंदोलनों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक राष्ट्रवाद अधूरा है।
इंडियन एसोसिएशन (1876): इन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। इस संस्था ने पाबना विद्रोह (1873-76) के दौरान किसानों के पक्ष में 'रैयत सभाएं' (Peasant Meetings) आयोजित कीं और बंगाल टेनेंसी एक्ट (1885) को पारित करवाने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। - द्वारकानाथ गांगुली (Dwarkanath Ganguly)
वैचारिक दृष्टिकोण: वे एक उग्र सुधारक और पत्रकार थे। उन्होंने असम के चाय बागानों में काम करने वाले कुलियों (indentured laborers) के शोषण को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया。
असम के कुलियों पर शोध: वे स्वयं अपनी जान जोखिम में डालकर असम के चाय बागानों में गए, वहाँ मजदूरों की गुलामों जैसी स्थिति को देखा और साक्ष्य जुटाए। उन्होंने ब्रिटिश बागान मालिकों के इस क्रूर तंत्र को "श्वेत दासता" (White Slavery) का नाम दिया। - आर. सी. दत्त / रमेश चंद्र दत्त (R.C. Dutt)
वैचारिक दृष्टिकोण: वे एक आईसीएस (ICS) अधिकारी और प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार थे। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Economic History of India' में सिद्ध किया कि भारत में बार-बार पड़ने वाले अकाल और गरीबी का मुख्य कारण ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियां (जैसे स्थायी बंदोबस्त का विकृत रूप) और जमींदारों द्वारा किसानों का अत्यधिक शोषण था。
पाबना पर विचार: उन्होंने अपने लेखों में पाबना के किसानों की कानूनी लड़ाई का पुरजोर समर्थन किया और कहा कि कृषि में स्थिरता के बिना देश का आर्थिक विकास असंभव है।
2. संबंधित पत्र-पत्रिकाएं और संपादकीय (Newspapers & Editorials)
- संजीवनी (Sanjivani):
संपादक: कृष्ण कुमार मित्र (द्वारकानाथ गांगुली के करीबी सहयोगी)।
योगदान: इस पत्र ने द्वारकानाथ गांगुली द्वारा असम के चाय बागानों से भेजी गई खोजी रिपोर्टों को "कैन कुलीर कुली कहानी" (चाय बागान के कुलियों की कहानी) शीर्षक से धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया। इस संपादकीय ने पूरे बंगाल के बुद्धिजीवियों को हिलाकर रख दिया था। - बेंगाली (The Bengalee):
संपादक: सुरेंद्रनाथ बनर्जी।
योगदान: आनंद मोहन बोस और इंडियन एसोसिएशन के विचारों को इस अंग्रेजी अखबार ने प्रमुखता से छापा। इसने भू-राजस्व में सुधार और किसानों को बेदखली से बचाने वाले कानून (Tenancy Bill) का खुलकर समर्थन किया। - सोम प्रकाश (Som Prakash):
योगदान: द्वारकानाथ गांगुली और आनंद मोहन बोस की राजनीतिक गतिविधियों और किसानों अधिकारों की वकालत को इस बंगाली साप्ताहिक ने हमेशा मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया।
3. विगत वर्षों के परीक्षा प्रश्न
कथन (A): आनंद मोहन बोस और सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में इंडियन एसोसिएशन ने बंगाल किरायेदारी विधेयक (Bengal Tenancy Bill) का समर्थन किया。
कारण (R): वे बंगाल के जमींदारों को पूरी तरह समाप्त कर वहाँ समाजवादी व्यवस्था लागू करना चाहते थे।
पुणे सार्वजनिक सभा, मोपला विद्रोह और कूका विद्रोह
1. वैचारिक पृष्ठभूमि और मुख्य चरित्र
- पुणे सार्वजनिक सभा (स्थापना: 1870)
संस्थापक: एम. जी. रानाडे, जी. वी. जोशी (काका साहब) और एस. एच. चिपलूनकर。
मुख्य चरित्र: यह संस्था जनता और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाती थी। 1875 के दक्कन किसान दंगों के समय इस सभा ने किसानों का खुलकर पक्ष लिया। इसके सदस्य गांवों में गए, किसानों की कर्ज की स्थिति पर आंकड़े जुटाए और ब्रिटिश सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। इसी दबाव के कारण दक्कन कृषक राहत अधिनियम (1879) पारित हुआ। - मोपला (माप्पिला) विद्रोह (1836–1921)
स्थान व नेतृत्व: केरल के मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम किसानों (मोपला) द्वारा हिंदू जमींदारों (जेनमी) और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह। 1921 में इसके मुख्य नेता अली मुसलियार और कुनहाम्मद हाजी थे。
मुख्य चरित्र: यह विद्रोह शुरुआत में जमींदारों के खिलाफ एक आर्थिक किसान आंदोलन था, जो खिलाफत और असहयोग आंदोलन से जुड़ने के बाद अत्यधिक राष्ट्रवादी हुआ। परंतु अंतिम चरण में ब्रिटिश दमन के कारण इसने सांप्रदायिक रूप ले लिया। - कूका विद्रोह (1840–1872)
स्थान व नेतृत्व: पंजाब में भगत जवाहर मल (सियान साहब) और उनके शिष्य बाबा राम सिंह के नेतृत्व में शुरू हुआ。
मुख्य चरित्र: प्रारंभ में यह सिख धर्म में सुधार (धार्मिक) के लिए शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। बाबा राम सिंह ने ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार और अपनी डाक व्यवस्था (स्वदेशी) की शुरुआत की, जिसे भारत में असहयोग आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है।
2. संबंधित पत्र-पत्रिकाएं और संपादकीय (Newspapers & Editorials)
- क्वार्टरली जर्नल ऑफ द पूना सार्वजनिक सभा (Quarterly Journal of PSS):
योगदान: एम. जी. रानाडे और जी. वी. जोशी ने इस पत्रिका में कई आर्थिक लेख लिखे। इन्होंने दक्कन के किसानों की गरीबी और साहूकारों के चंगुल का सांख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Analysis) प्रस्तुत किया। - द हिंदू (The Hindu) और केसरी (Kesari):
मोपला विद्रोह पर विचार: 1921 के मोपला विद्रोह के दौरान इन अखबारों ने शुरुआत में ब्रिटिश दमन की आलोचना की, लेकिन बाद में जब विद्रोह हिंसक और सांप्रदायिक हो गया, तो इन्होंने निर्दोष लोगों पर हुए अत्याचारों के संपादकीय लिखे। - जमींदार (Zamindar - अखबार):
संपादक: जफर अली खान। इस अखबार ने मालाबार के मोपला किसानों की आर्थिक बदहाली पर लगातार लेख छापे और इसे ब्रिटिश नीतियों का परिणाम बताया।
3. विचारक और उनके विचार (Thinkers & Thoughts)
- महादेव गोविंद रानाडे (M. G. Ranade):
विचार: उन्होंने पुणे सार्वजनिक सभा के मंच से कहा कि भारतीय किसानों को ऋणग्रस्तता से बचाने के लिए 'कृषि बैंकों' (Agricultural Banks) की स्थापना की जानी चाहिए ताकि वे साहूकारों के चंगुल से मुक्त हो सकें。 - महात्मा गांधी (मोपला विद्रोह पर विचार):
विचार: गांधीजी ने शुरुआत में मोपलाओं के साहस की प्रशंसा की और उन्हें 'बहादुर मोपला' कहा क्योंकि वे खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर रहे थे। हालांकि, बाद में हिंसा और जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर गांधीजी ने गहरा दुख व्यक्त किया。 - डॉ. बी. आर. अंबेडकर (मोपला विद्रोह पर विचार):
विचार: अपनी पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' में अंबेडकर ने मोपला विद्रोह की कड़ी आलोचना की। उनका विचार था कि यह विद्रोह केवल ब्रिटिश विरोधी नहीं था, बल्कि इसने मालाबार के स्थानीय हिंदुओं पर गंभीर अत्याचार किए जिसे केवल एक किसान आंदोलन कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता。
4. विगत वर्षों के परीक्षा प्रश्न
1. बाबा राम सिंह के नेतृत्व में कूका आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी का प्रचार किया था。
2. पुणे सार्वजनिक सभा ने 1875 के दक्कन दंगों के कारणों की जांच के लिए स्वयं एक समिति भेजी थी。
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सत्य है/हैं?
