ईरान, अमेरिका और इज़राइल का महायुद्ध: इतिहास, कारण और भारत पर असर
नमस्ते दोस्तों, स्वागत है आपका! आज हम बात करेंगे उस बेहद जटिल और तनावपूर्ण भू-राजनीतिक मुद्दे की, जिसने पूरी दुनिया की नींद उड़ा रखी है— ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच का संघर्ष।
क्या यह तीसरे विश्व युद्ध (World War 3) की शुरुआत है? घबराइए मत, ऐसा नहीं है। यह सिर्फ कुछ मीडिया घरानों द्वारा डर का माहौल बनाने का तरीका है। लेकिन स्थिति वाकई गंभीर है। आखिर यह संघर्ष क्या है? क्यों शुरू हुआ? मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति कैसे काम करती है? और सबसे महत्वपूर्ण, भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? आइए, शुरू से लेकर अब तक (2026 के हालिया घटनाक्रमों सहित) इस पूरे मामले को एक आसान और मानवीय भाषा में समझते हैं।
ईरान की भौगोलिक स्थिति और होर्मुज़ का जलडमरूमध्य
किसी भी देश की राजनीति को समझने के लिए उसका भूगोल समझना बहुत जरूरी है। ईरान (जिसे 1935 तक 'फारस' या 'पर्शिया' कहा जाता था) पश्चिम एशिया का एक बेहद महत्वपूर्ण देश है।
- पड़ोसी देश: ईरान 7 देशों के साथ अपनी जमीनी सीमा साझा करता है— पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अज़रबैजान, आर्मेनिया, तुर्की और इराक।
- समुद्री सीमा: इसकी समुद्री सीमा ओमान, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब से लगती है।
- होर्मुज़ का जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): यह एक बहुत ही संकरा (लगभग 33 किमी चौड़ा) लेकिन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल हर दिन यहीं से गुजरता है। हालिया विवादों में ईरान ने इसे बंद करने और यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमले की चेतावनी दी है, जिससे पूरी दुनिया सहमी हुई है।
ईरान की आबादी लगभग 8 करोड़ है और जीडीपी $413 बिलियन है। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस और चौथा सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार वाला देश है, लेकिन कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण वह इसका फायदा नहीं उठा पा रहा है。
मध्य पूर्व की राजनीति: शिया बनाम सुन्नी और प्रॉक्सी वॉर
मध्य पूर्व में मुख्य रूप से दो बड़ी ताकतें हैं— सऊदी अरब और ईरान।
- पूरी दुनिया में लगभग 85% मुस्लिम सुन्नी हैं और 15% शिया हैं।
- सऊदी अरब एक सुन्नी बहुल देश है, जबकि ईरान दुनिया के गिने-चुने शिया बहुल देशों में से एक है (अन्य इराक, बहरीन आदि हैं)।
- इन दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध नहीं होता, बल्कि ये 'प्रॉक्सी वॉर' (Proxy War) लड़ते हैं। यानी किसी तीसरे देश (जैसे यमन, सीरिया, इराक) में एक देश वहाँ की सरकार का समर्थन करता है और दूसरा देश विद्रोहियों को हथियार और पैसा देता है।
- अमेरिका सऊदी अरब का बहुत करीबी दोस्त है, इसलिए स्वाभाविक रूप से अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के दुश्मन हैं। हाल ही में इराक में सरकार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में भी यही दिखा, जहां ईरान इराकी सरकार के साथ था, जबकि अमेरिका और सऊदी अरब अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शनकारियों का समर्थन कर रहे थे।
अमेरिका और ईरान की दुश्मनी का इतिहास (1950 से आज तक)
आज का ईरान हमेशा से ऐसा नहीं था। 1950 के दशक में ईरान एक बहुत ही आधुनिक, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश था। लेकिन उसके पास तेल था, जो उसकी किस्मत और बर्बादी दोनों का कारण बना।
- 1951 का तेल राष्ट्रीयकरण: उस समय ब्रिटेन की 'एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी' ईरान का सारा तेल निकालती थी और मुनाफे का एक बहुत छोटा हिस्सा (मुश्किल से एक-तिहाई) ईरान को देती थी। 1951 में ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ (Mohammad Mosaddegh) ने इस तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया।
- 1953 का तख्तापलट (Operation Ajax): ब्रिटेन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अमेरिका (तत्कालीन राष्ट्रपति आइजनहावर) को कम्युनिज्म का डर दिखाया। नतीजतन, CIA ने 'ऑपरेशन अजाक्स' चलाकर मोसादेघ की सरकार को गिरा दिया और अमेरिका के समर्थक शाह रज़ा पहलवी को सत्ता में बैठा दिया। शाह ने अगले 25 साल तक अपनी क्रूर खुफिया पुलिस 'सावाक' (SAVAK) के जरिए ईरान पर अत्याचार किए।
- 1979 की इस्लामी क्रांति: शाह के दमन और अमेरिकी कठपुतली होने के कारण ईरान की जनता में भारी रोष था। अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में क्रांति हुई, शाह को देश से निकाल दिया गया और 2500 साल पुरानी राजशाही खत्म होकर ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया।
- ईरान बंधक संकट: जब अमेरिका ने बीमार शाह को इलाज के लिए पनाह दी, तो ईरानी छात्रों को लगा कि अमेरिका फिर से तख्तापलट की साजिश रच रहा है। उन्होंने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर लिया और 52 अमेरिकी राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। यह अमेरिका के लिए बहुत बड़ा अपमान था। बाद में अल्जीयर्स समझौते के तहत इन्हें छोड़ा गया। तभी से दोनों देशों के राजनयिक संबंध टूट गए (आज भी स्विट्जरलैंड दोनों के बीच मध्यस्थ का काम करता है)।
ईरान-इराक युद्ध और सद्दाम हुसैन का रोल
1979 की क्रांति के बाद, इराक के नेता सद्दाम हुसैन (जो सुन्नी थे, जबकि इराक में 60% आबादी शिया है) ने ईरान पर हमला कर दिया। खाड़ी देशों को डर था कि ईरान अपनी "इस्लामी क्रांति" उनके देशों में भी फैला देगा।
इस 8 साल (1980-1988) चले युद्ध में अमेरिका ने खुलकर सद्दाम हुसैन का साथ दिया। अमेरिका ने इराक को सैटेलाइट इंटेलिजेंस, हेलीकॉप्टर दिए और यहां तक कि जब इराक ने ईरान पर रासायनिक हथियारों (Chemical Weapons) का इस्तेमाल किया, तब भी अमेरिका ने आंखें मूंद लीं। इसने ईरान के मन में अमेरिका के प्रति नफरत को और गहरा कर दिया।
परमाणु समझौता (JCPOA) और डोनाल्ड ट्रम्प की एंट्री
अमेरिका और इज़राइल को हमेशा से डर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बना लेगा, जिससे मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा।
- 2015 का समझौता: इसे रोकने के लिए ओबामा प्रशासन के दौरान P5+1 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस + जर्मनी) और ईरान के बीच JCPOA (ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) साइन हुआ। ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम IAEA की निगरानी में सौंप दिया और बदले में उस पर से प्रतिबंध हटा लिए गए।
- 2018 में ट्रम्प की वापसी: डोनाल्ड ट्रम्प ने (कथित तौर पर इज़राइल के दबाव में और ओबामा की विरासत को खत्म करने के लिए) एकतरफा रूप से अमेरिका को इस डील से बाहर कर लिया और ईरान पर 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति के तहत कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।
जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या और बढ़ता तनाव
अमेरिका ने इतिहास में पहली बार ईरान की सेना (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स - IRGC) को 'विदेशी आतंकवादी संगठन' घोषित कर दिया।
- 3 जनवरी 2020: डोनाल्ड ट्रम्प के आदेश पर अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के सबसे बड़े सैन्य अधिकारी, कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी गई।
- अमेरिका के लिए सुलेमानी एक आतंकवादी था जो अमेरिकी सैनिकों पर हमले करवा रहा था। वहीं, ईरान के लिए वह एक राष्ट्रीय हीरो था जिसने ISIS को खत्म करने में मदद की थी।
- इसके जवाब में ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया। ईरान ने डोनाल्ड ट्रम्प पर ईनाम भी रखा और कहा कि उनकी दुश्मनी आम अमेरिकी नागरिकों से नहीं, बल्कि ट्रम्प प्रशासन से है।
(नोट: भू-राजनीति में कोई भी पूरी तरह 'सफेद' या 'काला' नहीं होता। एक देश के लिए जो आतंकवादी है, वह दूसरे के लिए स्वतंत्रता सेनानी हो सकता है। जार्ज बुश ने जैसे इराक में किया था, कुछ लोग मानते हैं कि ट्रम्प ने भी चुनाव से पहले अपनी छवि चमकाने के लिए यह सब किया, जिसके बारे में वह खुद 2013 में ओबामा को लेकर ट्वीट कर चुके थे।)
ईरान और इज़राइल की दुश्मनी के कारण
अब बात करते हैं इज़राइल की। 1979 से पहले ईरान और इज़राइल दोनों अमेरिका के दोस्त थे और उनके बीच भी अच्छे संबंध थे। लेकिन क्रांति के बाद स्थिति पलट गई:
- अस्तित्व को नकारना: ईरान इज़राइल को एक वैध देश नहीं मानता। ईरान ने होलोकॉस्ट (हिटलर द्वारा 60 लाख यहूदियों की हत्या) को भी मानने से इंकार किया है।
- फिलिस्तीन का समर्थन: खुद को इस्लामी दुनिया का नेता साबित करने के लिए ईरान फिलिस्तीन का खुलकर समर्थन करता है।
- एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस (Axis of Resistance): ईरान ने इज़राइल और अमेरिका के खिलाफ एक गुट बनाया है जिसमें गाजा का हमास (सुन्नी), लेबनान का हिज़्बुल्लाह (शिया), यमन के हूती विद्रोही और इराक के शिया मिलिशिया शामिल हैं। सीरिया के बशर अल-असद के पतन के बाद से पश्चिम एशिया में ईरान का यही एकमात्र नेटवर्क बचा है।
- परमाणु खतरा: इज़राइल को लगता है कि ईरान परमाणु बम सिर्फ उसे खत्म करने के लिए बना रहा है।
हालिया 2025-26 का भयंकर संघर्ष:
जून 2025 में दोनों के बीच 12 दिन का युद्ध हुआ (इज़राइल का 'ऑपरेशन राइजिंग लायन' और ईरान का 'ट्रू प्रॉमिस 3')।
इसके बाद 28 फरवरी 2026 को स्थिति और बिगड़ गई। इज़राइल ने 'ऑपरेशन रोरिंग लायन' और अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' तथा 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' (ईरान के इस्फहान, नतान्ज और फोर्डो परमाणु ठिकानों पर बंकर बस्टर बमों से हमला) शुरू किया।
इसके जवाब में ईरान ने 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4' के तहत खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए हैं। इस संघर्ष में हाल ही में ईरान के 30 साल तक सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला खामेनेई की अमेरिका द्वारा हत्या भी कर दी गई है (नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान हैं, लेकिन असली पावर सर्वोच्च नेता के पास ही होती है)।
भारत-ईरान संबंध और भारत पर इस युद्ध का असर
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर— भारत का इस सब में क्या रोल है और क्या नुकसान है?
भारत और ईरान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत गहरे हैं (1947 से पहले अविभाजित भारत ईरान के साथ सीमा साझा करता था)। लेकिन कूटनीतिक रूप से यह एक 'रोलर-कोस्टर' रहा है।
- शुरुआती दौर (1947-1990): जब शाह का शासन था, तब ईरान अमेरिका के साथ था और भारत गुटनिरपेक्ष। इसलिए दूरियां रहीं। क्रांति के बाद भी, भारत के इराक (सद्दाम हुसैन) से अच्छे संबंध होने के कारण ईरान से ज्यादा नज़दीकी नहीं बन पाई।
- संबंधों में सुधार: 1990 के दशक के बाद रिश्ते सुधरे। 2003 में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी भारत के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि बने।
- चाबहार पोर्ट: 2003 में वाजपेयी सरकार के दौरान इसका विचार आया और 2016 में पीएम मोदी ने इस पर त्रिपक्षीय (भारत-ईरान-अफगानिस्तान) समझौता किया। यह पोर्ट भारत को पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का रास्ता देता है। 2024 में भारत ने इसके 'शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल' के संचालन के लिए 10 साल का नया करार किया है।
- इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC): यह भारत, रूस और ईरान की एक अहम कनेक्टिविटी परियोजना है।
चुनौतियां और भारत पर मंडराता खतरा:
- तेल का संकट: इराक भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। अगर अमेरिका इराक पर प्रतिबंध लगाता है (जैसा कि उसने धमकी दी है), तो भारत को महंगे दामों पर कहीं और से तेल लेना पड़ेगा। ईरान से तो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने पहले ही तेल आयात शून्य कर दिया है।
- आर्थिक नुकसान: इस अस्थिरता का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ता है। सुलेमानी की मौत के अगले ही दिन भारतीय निवेशकों के 3 लाख करोड़ रुपये डूब गए थे।
- चीन का बढ़ता प्रभाव: अमेरिकी दबाव के कारण ईरान अब चीन के करीब जा रहा है। चीन ने ईरान के साथ 25 साल के लिए $400 बिलियन की डील की है। ईरान चीन के BRI (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) का हिस्सा है, जिसमें CPEC (जो POK से गुजरता है) भी शामिल है, जिसका भारत विरोध करता है। 2023 में चीन ने ईरान और सऊदी अरब की दोस्ती भी करवा दी।
- ईरान का रवैया और I2U2: ईरान ने कई बार भारत द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया है। साथ ही, भारत-इज़राइल-अमेरिका-यूएई के समूह (I2U2) को ईरान अपने खिलाफ मानता है।
निष्कर्ष:
पूरी दुनिया की भू-राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ अपने हित होते हैं। अमेरिका का 'मैक्सिमम प्रेशर', इज़राइल की सुरक्षा चिंताएं और ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस'— इन तीनों के टकराव ने आज पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक दिया है। भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है कि वह कैसे अपने सामरिक हितों (चाबहार पोर्ट), ऊर्जा जरूरतों (अरब देशों से तेल) और अमेरिका-इज़राइल जैसी ताकतों के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
उम्मीद है आपको इस लेख से इस पूरे मुद्दे का ए-टू-जेड (A to Z) इतिहास और वर्तमान स्थिति आसानी से समझ आ गई होगी!







