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स्थानीय स्वशासन, GOI Act 1919 & 1935 Notes | UGC NET, UPPSC, UPSC

स्थानीय स्वशासन, GOI Act 1919 & 1935 Notes | UGC NET, UPPSC, UPSC
राजनीति विज्ञान और भारतीय इतिहास: महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री

राजनीति विज्ञान और भारतीय इतिहास: विस्तृत अध्ययन सामग्री

स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government)

स्थानीय स्वशासन का अर्थ है जमीनी स्तर पर लोगों द्वारा स्वयं का शासन, ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralization) हो सके।

  • जनक (Father): लॉर्ड रिपन (1882 के उनके संकल्प को स्थानीय स्वशासन का 'मैग्ना कार्टा' कहा जाता है)।
  • आधुनिक भारत में: पंचायती राज व्यवस्था इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

संवैधानिक दर्जा:

  • 73वां संविधान संशोधन (1992): इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर) लागू की गई। संविधान में भाग IX और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  • 74वां संविधान संशोधन (1992): इसके तहत शहरी क्षेत्रों के लिए नगरपालिकाओं की व्यवस्था की गई। संविधान में भाग IX-A और 12वीं अनुसूची जोड़ी गई।

भारत सरकार अधिनियम 1919 (GOI Act 1919)

इसे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu-Chelmsford Reforms) के नाम से भी जाना जाता है।

  • प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy): प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांटा गया— 'हस्तांतरित' (Transferred - जिन पर भारतीय मंत्री निर्णय लेते थे) और 'आरक्षित' (Reserved - जिन पर गवर्नर का नियंत्रण था)।
  • द्विसदनीय व्यवस्था: केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधायिका (राज्य परिषद और केंद्रीय विधान सभा) की स्थापना की गई।
  • प्रत्यक्ष चुनाव: देश में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली शुरू की गई और महिलाओं को (सीमित संख्या में) वोट देने का अधिकार मिला।
  • लोक सेवा आयोग: सिविल सेवकों की भर्ती के लिए एक केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया (जो 1926 में बना)।

भारत सरकार अधिनियम 1935 (GOI Act 1935)

यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे लंबा अधिनियम था और वर्तमान भारतीय संविधान का सबसे बड़ा स्रोत (लगभग 70% हिस्सा) है।

  • प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy): प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया और उन्हें स्वायत्तता दी गई।
  • केंद्र में द्वैध शासन: जो द्वैध शासन प्रांतों में खत्म हुआ, उसे केंद्र स्तर पर लागू कर दिया गया।
  • अखिल भारतीय संघ: एक अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें ब्रिटिश प्रांत और देशी रियासतें शामिल होनी थीं (हालाँकि यह कभी लागू नहीं हो सका)।
  • शक्तियों का विभाजन: शक्तियों को तीन सूचियों में बांटा गया: संघ सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची। अवशिष्ट शक्तियां (Residuary powers) वायसराय को दी गईं।
  • संस्थाओं की स्थापना: इसके तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और 1937 में एक संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना की गई।

महात्मा गांधी (स्वशासन और राज्य पर विचार)

गांधीजी का राजनीतिक दर्शन मुख्य रूप से नैतिकता, अहिंसा और विकेंद्रीकरण पर आधारित था。

  • ग्राम स्वराज्य (Gram Swaraj): गांधीजी का मानना था कि "भारत की आत्मा गांवों में बसती है।" वे चाहते थे कि हर गांव आत्मनिर्भर हो और अपने फैसले खुद ले।
  • राज्यविहीन समाज (Stateless Society): दार्शनिक रूप से गांधीजी एक 'अराजकतावादी' (Anarchist) माने जाते हैं। उनका मानना था कि राज्य एक हिंसक संस्था है और एक आदर्श समाज में राज्य (सरकार) की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
  • संवैधानिक प्रभाव: गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में ग्राम पंचायतों के गठन का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।

प्रमुख विचारक (Famous Thinkers)

राजनीति विज्ञान और स्वशासन के संदर्भ में कुछ प्रमुख भारतीय और पश्चिमी विचारकों के मुख्य सिद्धांत:

  • बलवंत राय मेहता: भारत में 'पंचायती राज व्यवस्था के वास्तुकार'। इन्होंने ही 1957 में त्रि-स्तरीय पंचायत (ग्राम, पंचायत समिति, जिला परिषद) का सुझाव दिया था।
  • अरस्तू (Aristotle): राजनीति विज्ञान के जनक। उनका प्रसिद्ध कथन है: "मनुष्य स्वभाव से एक राजनीतिक/सामाजिक प्राणी है।"
  • जीन जैक्स रूसो (Jean-Jacques Rousseau): 'सामाजिक समझौता' (Social Contract) और 'लोकप्रिय संप्रभुता' (Popular Sovereignty) के जनक। कथन: "मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा है।"
  • कार्ल मार्क्स (Karl Marx): वैज्ञानिक समाजवाद के जनक। इन्होंने 'वर्ग संघर्ष' (Class Struggle) का सिद्धांत दिया और मजदूरों से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया।
  • जॉन लॉक (John Locke): उदारवाद के जनक (Father of Liberalism)। उन्होंने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति (Life, Liberty, and Property) को प्राकृतिक अधिकार माना।

​1. स्थानीय स्वशासन का ऐतिहासिक विकास

  • ​लॉर्ड मेयो का प्रस्ताव (1870): भारत में वित्तीय विकेंद्रीकरण (Financial Decentralisation) की शुरुआत यहीं से मानी जाती है।
  • ​राजकीय विकेंद्रीकरण आयोग (1907): इसके अध्यक्ष सी.ई. हॉबहाउस थे। इस आयोग ने ग्राम पंचायतों के विकास पर जोर दिया था।
  • ​सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952): स्वतंत्र भारत में ग्रामीण विकास का यह पहला बड़ा प्रयास था, लेकिन नौकरशाही के अत्यधिक प्रभाव के कारण यह विफल रहा। इसी की विफलता की जांच के लिए बलवंत राय मेहता समिति बनी थी।

​2. प्रमुख समितियां और उनकी विशिष्ट सिफारिशें (कालक्रम में)

​नेट/पीजीटी में अक्सर इन समितियों को उनके वर्ष के अनुसार व्यवस्थित करने (Chronological Order) या उनकी विशिष्ट सिफारिशों का मिलान करने को कहा जाता है:

​बलवंत राय मेहता समिति (1957):
  • ​इन्होंने 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' (Democratic Decentralisation) शब्द गढ़ा।
  • ​त्रि-स्तरीय व्यवस्था का सुझाव दिया।
  • ​नोट: 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर में जवाहरलाल नेहरू द्वारा पहली पंचायत का उद्घाटन किया गया।
​अशोक मेहता समिति (1977):
  • ​जनता पार्टी की सरकार द्वारा गठित।
  • ​द्वि-स्तरीय पंचायत (जिला परिषद और मंडल पंचायत) का सुझाव।
  • ​पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों की खुली भागीदारी की वकालत की।
  • ​SC/ST के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की मांग की।
​जी. वी. के. राव समिति (1985):
  • ​इन्होंने तत्कालीन पंचायती व्यवस्था को "बिना जड़ की घास" (Grass without roots) कहा था, क्योंकि सारी शक्तियां नौकरशाही (Bureaucracy) के पास थीं।
  • ​जिला स्तर पर 'जिला विकास आयुक्त' (DDC) के पद के सृजन का सुझाव दिया।
​एल. एम. सिंघवी समिति (1986):
  • ​पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की पहली सबसे स्पष्ट और मजबूत सिफारिश।
  • ​'न्याय पंचायतों' के गठन और ग्राम सभा को मजबूत करने पर जोर।
​पी. के. थुंगन समिति (1988) और गाडगिल समिति (1988):
  • ​इन दोनों ने भी संवैधानिक दर्जे का समर्थन किया। गाडगिल समिति की रिपोर्ट ही 73वें संशोधन का आधार बनी।

​3. परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद (भाग IX)

​नेट और पीजीटी में सीधे अनुच्छेद पूछे जाते हैं:

  • ​अनुच्छेद 243(A): ग्राम सभा का प्रावधान। (ग्राम सभा में गांव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं)।
  • ​अनुच्छेद 243(D): आरक्षण। SC/ST को जनसंख्या के अनुपात में, और महिलाओं को कम से कम 1/3 (33%) आरक्षण। (बिहार 50% महिला आरक्षण देने वाला पहला राज्य है)।
  • ​अनुच्छेद 243(G): पंचायतों की शक्तियां और प्राधिकार। (11वीं अनुसूची के 29 विषय इसी के तहत आते हैं)।
  • ​अनुच्छेद 243(I): राज्य वित्त आयोग का गठन। (राज्यपाल द्वारा हर 5 साल में)।
  • ​अनुच्छेद 243(K): राज्य निर्वाचन आयोग। (यह केवल पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव कराता है, विधानसभा के नहीं)।

​4. पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act)

  • ​पूरा नाम: Panchayat (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996.
  • ​समिति: दिलीप सिंह भूरिया समिति की सिफारिश पर।
  • ​उद्देश्य: संविधान के भाग IX (पंचायती राज) के प्रावधानों को कुछ संशोधनों के साथ 5वीं अनुसूची के आदिवासी क्षेत्रों में लागू करना। यह ग्राम सभा को जल, जंगल और जमीन के संबंध में विशेष अधिकार देता है।

​5. विचारकों के दृष्टिकोण (NET/PGT विशेष)

  • ​बी. आर. अंबेडकर: इन्होंने संविधान सभा में ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने का विरोध किया था। उनका प्रसिद्ध कथन है: "भारतीय गांव अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का अड्डा (den of ignorance and communalism) हैं।" वे मानते थे कि स्थानीय स्तर पर सवर्ण और दबंग जातियां दलितों का और शोषण करेंगी।
  • ​महात्मा गांधी: इन्होंने 'ओशनिक सर्कल' (Oceanic Circle) का सिद्धांत दिया, जिसमें सत्ता का प्रवाह केंद्र से बाहर की ओर न होकर, नीचे (गांव) से ऊपर की ओर होता है।
  • ​जयप्रकाश नारायण (JP): इन्होंने स्थानीय स्तर पर दलविहीन लोकतंत्र (Partyless Democracy) का कड़ा समर्थन किया। उनका मानना था कि पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों के आने से गांव में गुटबाजी और तनाव फैलेगा।

​1. भारत सरकार अधिनियम 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) के सूक्ष्म बिंदु

​पृष्ठभूमि और आधार:
  • ​अगस्त घोषणा (1917): भारत सचिव एडविन मोंटेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश संसद में यह घोषणा की थी कि ब्रिटिश शासन का लक्ष्य भारत में "क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार" (Responsible Government) की स्थापना करना है। इस अधिनियम की प्रस्तावना इसी घोषणा पर आधारित थी।
​प्रांतीय द्वैध शासन (Dyarchy) का गहरा विश्लेषण:
  • ​द्वैध शासन के जनक लियोनेल कर्टिस (Lionel Curtis) को माना जाता है।
  • ​प्रांतीय विषयों का विभाजन:
  • ​आरक्षित विषय (Reserved Subjects): पुलिस, न्याय, वित्त, भू-राजस्व और सिंचाई। इन पर गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद (Executive Council) की मदद से शासन करता था, जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
  • ​हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects): शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कृषि। इन पर गवर्नर भारतीय मंत्रियों की सलाह से काम करता था, जो प्रांतीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी थे।
​मताधिकार और प्रतिनिधित्व:
  • ​सीमित मताधिकार: चुनाव प्रत्यक्ष तो थे, लेकिन वोट देने का अधिकार केवल संपत्ति, कर (Tax) और शिक्षा के आधार पर दिया गया था। भारत की केवल लगभग 10% आबादी को ही वोटिंग का अधिकार मिला।
  • ​सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार: 1909 (मार्ले-मिंटो) में केवल मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मिला था। 1919 में इसे बढ़ाकर सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन और यूरोपियनों के लिए भी लागू कर दिया गया।
​केंद्रीय विधायिका की संरचना:
  • ​पहली बार केंद्र में द्विसदनीय व्यवस्था बनी:
  • ​राज्य परिषद (Upper House): कार्यकाल 5 वर्ष। 60 सदस्य (34 निर्वाचित, 26 मनोनीत)।
  • ​केंद्रीय विधान सभा (Lower House): कार्यकाल 3 वर्ष। 145 सदस्य (104 निर्वाचित, 41 मनोनीत)।
​अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान:
  • ​नरेश मंडल (Chamber of Princes): देशी रियासतों के महत्व को देखते हुए 1921 में 'नरेश मंडल' की स्थापना की गई (जिसके अध्यक्ष वायसराय होते थे)।
  • ​भारत सचिव के काम को कम करने के लिए लंदन में 'भारत के उच्चायुक्त' (High Commissioner for India) का एक नया पद बनाया गया।

​2. भारत सरकार अधिनियम 1935 के सूक्ष्म बिंदु

​पृष्ठभूमि:
  • ​यह अधिनियम साइमन कमीशन की रिपोर्ट, तीन गोलमेज सम्मेलनों की चर्चाओं और 1933 के 'श्वेत पत्र' (White Paper) पर आधारित था। इसे ब्रिटिश संसद की 'संयुक्त प्रवर समिति' (जिसके अध्यक्ष लॉर्ड लिनलिथगो थे) की सिफारिशों पर अंतिम रूप दिया गया था।
  • ​इसमें 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थीं। इसमें कोई नई 'प्रस्तावना' (Preamble) नहीं थी (1919 के अधिनियम की प्रस्तावना को ही इसमें जोड़ दिया गया था)।
​अखिल भारतीय संघ (All India Federation):
  • ​यह संघ ब्रिटिश प्रांतों (11), चीफ कमिश्नर क्षेत्रों (6) और देशी रियासतों से मिलकर बनना था।
  • ​विफलता का कारण: रियासतों का इसमें शामिल होना ऐच्छिक (Voluntary) था और उन्होंने संघ में शामिल होने से इनकार कर दिया, इसलिए यह संघीय व्यवस्था कभी अस्तित्व में नहीं आ सकी।
​शक्तियों का विशिष्ट विभाजन (नेट के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण):
  • ​संघीय सूची: 59 विषय (विदेशी मामले, रक्षा, मुद्रा आदि)।
  • ​प्रांतीय सूची: 54 विषय (पुलिस, प्रांतीय लोक सेवा, शिक्षा)।
  • ​समवर्ती सूची: 36 विषय (दंड विधि, विवाह, तलाक)।
  • ​अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers): अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विपरीत, 1935 के अधिनियम में अवशिष्ट शक्तियां न तो केंद्र को दी गईं और न ही प्रांतों को, बल्कि यह गवर्नर-जनरल (वायसराय) के विवेकाधिकार में निहित थीं।
​केंद्र में द्वैध शासन:
  • ​प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर 'प्रांतीय स्वायत्तता' लागू की गई, लेकिन केंद्र में संघीय विषयों को दो भागों में बांटा गया:
  • ​आरक्षित (Reserved): रक्षा, विदेशी मामले, जनजातीय क्षेत्र और धार्मिक मामले (वायसराय के अधीन)।
  • ​हस्तांतरित (Transferred): अन्य सभी विषय (मंत्रियों के अधीन)।
​प्रांतों में द्विसदनीय व्यवस्था:
  • ​11 में से 6 प्रांतों में द्विसदनीय (विधान परिषद और विधान सभा) व्यवस्था लागू की गई। ये 6 प्रांत थे: बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत (UP) और असम।
​पृथक निर्वाचन का विस्तार और पूना पैक्ट का प्रभाव:
  • ​अधिनियम में दलित जातियों (Scheduled Castes), महिलाओं और मजदूर वर्ग के लिए अलग निर्वाचन का प्रावधान किया गया था। (हालाँकि, दलितों के लिए यह प्रावधान गांधी-अंबेडकर के बीच हुए 'पूना पैक्ट' के तहत आरक्षित सीटों के रूप में संशोधित होकर लागू हुआ था)।
​भू-राजनैतिक परिवर्तन:
  • ​बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया (1937 में प्रभावी)।
  • ​दो नए प्रांत बनाए गए: सिंध (बॉम्बे से अलग करके) और उड़ीसा (बिहार से अलग करके)।
​विचारकों और नेताओं की प्रसिद्ध टिप्पणियां (Quotes):
​जवाहरलाल नेहरू: "यह एक ऐसी मशीन है जिसमें ब्रेक तो बहुत मजबूत हैं, लेकिन इंजन है ही नहीं।" तथा इसे "दासता का नया चार्टर" (New Charter of Slavery) कहा।
​मोहम्मद अली जिन्ना: इसे "पूर्णतः सड़ा हुआ, बुनियादी तौर पर खराब और पूरी तरह से अस्वीकार्य" बताया।
​मदन मोहन मालवीय: "यह अधिनियम हम पर थोपा गया है। यह बाहर से तो लोकतांत्रिक दिखता है लेकिन अंदर से खोखला है।"
​क्लेमेंट एटली: "इस अधिनियम में 'डोमिनियन स्टेट्स' (अधिराज्य का दर्जा) का कोई जिक्र नहीं है।"
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