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मैत्रक एवं मौखरि राजवंश: इतिहास, शासक, अभिलेख | UPSC, UPPSC

मैत्रक एवं मौखरि राजवंश: इतिहास, शासक, अभिलेख | UPSC, UPPSC


मैत्रक राजवंश, मौखरि राजवंश, Maitrak Dynasty, Maukhari Dynasty,



 मैत्रक राजवंश (Maitrak Dynasty) ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद छठी से आठवीं शताब्दी के दौरान वल्लभी (सौराष्ट्र, गुजरात) को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया। 


1. पृष्ठभूमि और स्थापना (Background & Foundation)

  • संस्थापक: इस वंश की स्थापना भट्टार्क (Bhattarka) ने लगभग 475 ईस्वी में की थी।

  • स्थिति: भट्टार्क गुप्त साम्राज्य के तहत सौराष्ट्र के सैन्य गवर्नर (सेनापति) थे।

  • उपाधि: शुरुआती शासकों (भट्टार्क और धरसेन प्रथम) ने राजा के बजाय केवल 'सेनापति' की उपाधि धारण की, जो गुप्तों के प्रति उनकी नाममात्र की अधीनता को दर्शाता है।

  • राजधानी: वल्लभी (आधुनिक वला, भावनगर, गुजरात)। यह उस समय का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र था।  


2. शासकों का कालानुक्रमिक क्रम और मुख्य तथ्य (Chronological Order of Rulers)

भट्टार्क (लगभग 475 - 492 ई.)

  • मैत्रक वंश के संस्थापक

  • इन्होंने सेनापति की उपाधि धारण की और वल्लभी को मुख्यालय बनाया। 

धरसेन प्रथम (लगभग 493 - 499 ई.)

  • भट्टार्क के बड़े पुत्र।

  • इन्होंने भी स्वयं को केवल 'सेनापति' ही कहा। 

द्रोणसिंह (लगभग 500 - 520 ई.)

  • भट्टार्क के दूसरे पुत्र।

  • प्रथम स्वतंत्र शासक: इन्होंने सबसे पहले 'महाराज' की उपाधि धारण की।

  • गुप्त सम्राट (संभवतः बुद्धगुप्त या भानुगुप्त) ने स्वयं आकर इनका राज्याभिषेक किया था। 

ध्रुवसेन प्रथम (लगभग 525 - 545 ई.)

  • द्रोणसिंह के भाई।

  • वल्लभी जैन संगीति (512/526 ई.): इनके शासनकाल में देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में द्वितीय जैन संगीति वल्लभी में आयोजित हुई, जिसमें जैन ग्रंथों (आगमों) को अंतिम रूप से लिपिबद्ध किया गया।

  • यह परम-भागवत (वैष्णव) धर्म के अनुयायी थे, जबकि अधिकांश मैत्रक शासक शैव (परम-माहेश्वर) थे। 

गुहसेन (लगभग 553 - 569 ई.) 

  • इन्होंने गुप्तों के जुए को पूरी तरह उतार फेंका और मैत्रक सत्ता को सुदृढ़ किया।

  • इनके समय से मैत्रक शासक पूरी तरह स्वतंत्र राजाओं के रूप में कार्य करने लगे।

धरसेन द्वितीय (लगभग 569 - 589 ई.) 

  • इनके काल में मैत्रक राज्य का विस्तार हुआ।

  • इन्होंने महासामंत और महाधिराज जैसी उपाधियां धारण कीं।

शिलादित्य प्रथम 'धर्मादित्य' (लगभग 590 - 615 ई.) 

  • इन्हें मैत्रक वंश का पहला महान शासक माना जाता है।

  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में शिलादित्य प्रथम की अत्यधिक प्रशंसा की है और उन्हें एक अत्यधिक दयालु और न्यायप्रिय बौद्ध धर्मानुयायी राजा बताया है।

  • इन्होंने वल्लभी में कई बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया। 

खरग्रह प्रथम (लगभग 615 - 621 ई.) और धरसेन तृतीय (लगभग 621 - 627 ई.)

  • शिलादित्य प्रथम के बाद उनके भाई खरग्रह प्रथम और फिर उनके पुत्र धरसेन तृतीय ने शासन किया। इस दौरान राज्य स्थिर रहा। 

ध्रुवसेन द्वितीय 'बालinternal/बालादित्य' (लगभग 627 - 641 ई.)

  • हर्षवर्धन से संबंध: कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन ने वल्लभी पर आक्रमण किया था। ध्रुवसेन द्वितीय पराजित हुए और उन्होंने भड़ौच के गुर्जर राजा दद्दा द्वितीय के यहाँ शरण ली। बाद में हर्ष ने उनसे अपनी पुत्री का विवाह कराया और वल्लभी को अपना दामाद-राज्य (संबद्ध मित्र) बना लिया।

  • ह्वेनसांग की यात्रा (640 ई.): चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) इनके शासनकाल में वल्लभी आया था। उसने ध्रुवसेन द्वितीय को हर्ष की प्रयाग महामोक्ष परिषद में उपस्थित देखा था।

धरसेन चतुर्थ (लगभग 641 - 650 ई.)

  • ध्रुवसेन द्वितीय के पुत्र और हर्षवर्धन के नाती।

  • सर्वोच्च उपाधियाँ: इन्होंने मैत्रक वंश में सबसे पहले 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर चक्रवर्ती' जैसी चक्रवर्ती उपाधियाँ धारण कीं।

  • इनके काल में मैत्रक साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था। प्रसिद्ध कवि भट्टि (भट्टिकाव्य/रावणवध के रचयिता) इनके ही दरबारी कवि थे।

परवर्ती शिलादित्य (शिलादित्य द्वितीय से VII)

  • धरसेन चतुर्थ के बाद साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। इस दौरान श्रृंखला में कई राजा हुए जिन्हें शिलादित्य (II, III, IV, V, VI, VII) के नाम से जाना जाता है।

  • शिलादित्य सप्तम (VII) इस वंश के अंतिम ज्ञात शासक थे। 


3.  (High-Yield Facts for Prelims)

  • धर्म और सहिष्णुता: मैत्रक शासक मुख्य रूप से शैव (परम-माहेश्वर) थे और उनका राजकीय चिह्न 'नंदी' (बैल) था। हालांकि, वे परम धार्मिक सहिष्णु थे। उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म को भी भारी दान और संरक्षण दिया।

  • वल्लभी विश्वविद्यालय: यह तक्षशिला और नालंदा की तरह ही प्राचीन भारत का एक प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र था। गुणमति और स्थिरमति जैसे प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान यहीं से संबद्ध थे। ह्वेनसांग और इत्सिंग (I-Tsing) दोनों ने नालंदा के साथ इसकी तुलना की है। यह मुख्यतः हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का बड़ा केंद्र था, लेकिन यहाँ नीतिशास्त्र, चिकित्सा और प्रशासन की शिक्षा भी दी जाती थी।

  • पतन (End of Dynasty): लगभग 776-783 ईस्वी के दौरान सिंध के अरबों (ताजिकों) ने वल्लभी पर समुद्री मार्ग से भयंकर आक्रमण किया। इस आक्रमण में अंतिम राजा शिलादित्य सप्तम मारे गए और वल्लभी शहर व विश्वविद्यालय को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया, जिससे मैत्रक वंश का अंत हो गया। 




सभी विशिष्ट प्रशासनिक पद, अभिलेखीय साक्ष्य, भू-राजस्व व्यवस्था, और गुप्त तथ्य नीचे कालानुक्रमिक क्रम और विषयवार दिए गए हैं:


1. छूटे हुए महत्वपूर्ण शासक और विशिष्ट तथ्य (Missing Rulers & Specific Facts)

  • धरसेन द्वितीय (569-589 ई.) के विशिष्ट साक्ष्य: इनके काल के सबसे अधिक ताम्रपत्र अभिलेख (Copper-plate grants) मिले हैं। इन्होंने ही सबसे पहले अपने पूर्वज भट्टार्क के लिए 'मैत्रक' शब्द का औपचारिक प्रयोग किया था।

  • शिलादित्य प्रथम 'धर्मादित्य' (590-615 ई.) का अभिलेख: इनके काल का प्रसिद्ध नवसारी ताम्रपत्र है। इनके समय मैत्रक सत्ता का विस्तार मालवा (पश्चिमी मालवा) तक हो गया था।

  • खरग्रह प्रथम (615-621 ई.): इन्होंने उज्जैनी (Ujjain) में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया था, जो दर्शाता है कि मालवा इनके पूर्ण नियंत्रण में था।

  • ध्रुवसेन द्वितीय 'बालादित्य' (627-641 ई.) और ह्वेनसांग का विवरण: ह्वेनसांग ने इन्हें हर्षवर्धन का दामाद होने के साथ-साथ स्वभाव से 'उग्र और छिछली बुद्धि वाला' (Violent and hasty) कहा है, लेकिन साथ ही यह भी लिखा कि वे बौद्ध धर्म के प्रति अत्यधिक श्रद्धालु थे।

  • शिलादित्य तृतीय (662-684 ई.): इनके शासनकाल में दक्षिण के चालुक्यों (नवसारी के चालुक्य जयसिंह वर्मन) और मैत्रकों के बीच तीव्र संघर्ष हुआ। चालुक्य अभिलेखों में मैत्रकों को पराजित करने का दावा किया गया है।

  • शिलादित्य पंचम (700-705 ई.): इनके काल में अरबों का पहला बड़ा समुद्री आक्रमण (लगभग 702-703 ई. में) सौराष्ट्र के तट पर हुआ, जिसे मैत्रकों ने विफल कर दिया था।


2. मैत्रक प्रशासन और विशिष्ट शब्दावली (Administrative Terms )

 मैत्रक काल की प्रमुख शब्दावली:

  • प्रशासनिक विभाजन (Decentralization): साम्राज्य कई स्तरों पर बंटा था: भुक्ति (बड़ी इकाई) ➔ विषय ➔ आहार (या प्रpatha) ➔ पेटक ➔ ग्राम

  • द्रंगिका (Drangika): नगर या बंदरगाह शहर का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी या नगरपाल।

  • महत्तर (Mahattara): ग्राम सभा या पंचायत के वरिष्ठ सदस्य (Venerable Village Elders)।

  • ध्रुवाधिकरण (Dhruvadhikarana): यह बहुत महत्वपूर्ण पद था। यह अधिकारी राजा के हिस्से का अनाज (राजकीय कर) इकट्ठा करने और उसका हिसाब रखने का प्रभारी था।

  • शाल्किक (Shaulkika): चुंगी और सीमा शुल्क (Tolls and Customs Duty) वसूल करने वाला अधिकारी।

  • चोरौद्धरणिक (Chorauddharanika): चोरों और डाकुओं से जनता की रक्षा करने वाला पुलिस अधिकारी (आधुनिक SP स्तर का पद)।


3. अर्थव्यवस्था और भू-राजस्व (Economy & Land Revenue)

  • भूमि के प्रकार: अभिलेखों में दो प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है:

    1. राजकीय भूमि (State Land): जिस पर राजा का सीधा नियंत्रण होता था।

    2. ब्राह्मण/विहार भूमि (Agrahara): जो धार्मिक कार्यों के लिए कर-मुक्त (Tax-free) दान दी जाती थी।

  • कर व्यवस्था (Taxation): मुख्य कर 'उद्रंग' (Udranga - स्थायी काश्तकारों पर कर) और 'उपरिकर' (Uparikara - अस्थायी काश्तकारों पर कर) थे। इसके अलावा 'धान्य' (अनाज के रूप में कर) और 'हिरण्य' (नकद कर) भी लिया जाता था।

  • व्यापारिक संघ (Guilds): वल्लभी में 'श्रेणी' या 'निगम' (Guilds) बहुत शक्तिशाली थे। रेशम, वस्त्र और मसालों के व्यापार के कारण वल्लभी को पश्चिमी भारत का सबसे अमीर शहर कहा जाता था।


4. सांस्कृतिक एवं धार्मिक गुप्त तथ्य (Cultural & Epigraphical Facts)

  • राजकीय लिपि और भाषा: मैत्रकों के सभी आधिकारिक अभिलेख संस्कृत भाषा में हैं और उनकी लिपि पश्चिमी गुप्त लिपि (Western Gupta Script) का ही एक विकसित रूप है।

  • सती प्रथा के साक्ष्य: मैत्रक अभिलेखों में कुछ रानियों के सती होने के भी परोक्ष संकेत मिलते हैं।

  • वल्लभी विश्वविद्यालय के आचार्य: चीनी यात्री इत्सिंग (I-Tsing) के अनुसार, इस विश्वविद्यालय के स्नातक (Graduates) अपनी उच्च बौद्धिक क्षमता के कारण राजाओं के दरबार में उच्च प्रशासनिक पदों (जैसे सचिव, सलाहकार) पर नियुक्त किए जाते थे।


✅ वल्लभी के मैत्रक राजवंश (Maitrak Dynasty)

मैत्रक शासकों ने गुप्तों की प्रशासनिक व्यवस्था को अपनाते हुए पश्चिमी भारत में एक सुदृढ़ व्यापारिक साम्राज्य खड़ा किया, जिसने ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्रियों को आकर्षित किया और वल्लभी को बौद्ध एवं जैन धर्म का महाकेंद्र बनाया।

✅ निष्कर्ष (Summary)
मैत्रक राजवंश ने गुप्तोत्तर काल में पश्चिमी भारत में राजनीतिक स्थिरता प्रदान की और वल्लभी को शिक्षा व व्यापार का वैश्विक केंद्र बनाया, जिसका अंत 8वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अरब आक्रमणकारियों द्वारा हुआ।


मौखर्य राजवंश (Maukhari Dynasty) छठी शताब्दी ईस्वी के दौरान कन्नौज (कान्यकुब्ज) पर शासन करने वाला एक शक्तिशाली गुप्तोत्तर (Post-Gupta) राजवंश था। इस वंश ने उत्तर भारत की राजनीति का केंद्र मगध से हटाकर कन्नौज स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


1. हरि-वर्मा (लगभग 510 – 525 ईस्वी)

  • संस्थापक: इन्हें मौखरि वंश का संस्थापक माना जाता है।

  • स्थिति: इन्होंने 'महाराज' की उपाधि धारण की थी, जिसका अर्थ है कि वे एक सामंत राजा (संभवतः उत्तर-गुप्तों या हूणों के अधीन) थे।

2. आदित्य-वर्मा (लगभग 525 – 545 ईस्वी)

  • वंश: यह हरि-वर्मा के पुत्र थे।

  • स्थिति: ये भी एक सामंत प्रमुख (महाराज) ही बने रहे, इन्हें पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिली थी।

  • वैवाहिक गठबंधन: इनका विवाह उत्तर-गुप्त (Later Gupta) वंश की राजकुमारी हर्षगुप्ता से हुआ था, जिससे दोनों राजवंशों के संबंध कुछ समय के लिए मजबूत हुए।

3. ईश्वर-वर्मा (लगभग 545 – 554 ईस्वी)

  • वंश: यह आदित्य-वर्मा के पुत्र थे।

  • स्थिति: पूर्ण स्वतंत्रता से पहले यह इस वंश के अंतिम सामंत शासक (महाराज) थे।

  • वैवाहिक गठबंधन: इनका विवाह भी उत्तर-गुप्त वंश की राजकुमारी उपगुप्ता से हुआ था।

  • उपलब्धियां: अभिलेखों से संकेत मिलता है कि इन्होंने अपने क्षेत्र का विस्तार करना शुरू कर दिया था और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों से इनके संघर्ष हुए थे।

4. ईशान-वर्मा (लगभग 554 – 575 ईस्वी)

  • संप्रभुता: यह इस राजवंश के पहले पूर्ण स्वतंत्र संप्रभु शासक थे।

  • उपाधि: इन्होंने पहली बार 'महाराजाधिराज' की शाही उपाधि धारण की थी।

  • प्रमुख उपलब्धियां:

    • इन्होंने उत्तर भारत में आतंक मचाने वाले हूणों को पराजित किया।

    • इन्होंने बंगाल के गौड़ों और आंध्र के राजाओं (विष्णुकिंडिन) को हराया।

  • गुप्त प्रतिद्वंद्विता: इनकी स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही मौखरियों और उत्तर-गुप्तों (मगध के कुमारगुप्त के साथ) के बीच पीढ़ियों तक चलने वाला 'मौखरि-उत्तर गुप्त संघर्ष' शुरू हो गया।

  • मुख्य स्रोत: इनका 'हराहा अभिलेख' (554 ईस्वी) इस काल की सैन्य जीतों की जानकारी देने वाला सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है।

5. सर्व-वर्मा (लगभग 575 – 600 ईस्वी)

  • वंश: यह ईशान-वर्मा के पुत्र थे।

  • उपाधि: महाराजाधिराज

  • सैन्य सफलता: इन्होंने उत्तर-गुप्त वंश के राजा दामोदरगुप्त को युद्ध में पराजित कर मार डाला और इस प्रकार मगध पर मौखरियों का वर्चस्व स्थापित किया।

  • साम्राज्य विस्तार: इनके समय मौखरि साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार सबसे अधिक हुआ, जो आधुनिक उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार के कुछ हिस्सों तक फैल गया था।

  • मुख्य स्रोत: 'असीरगढ़ ताम्र मुद्रा' (Asirgarh Copper Seal) इनके शासनकाल का प्रमुख स्रोत है।

6. अवंति-वर्मा (लगभग 600 – 605 ईस्वी)

  • वंश: यह सर्व-वर्मा के पुत्र थे।

  • उपाधि: महाराजाधिराज

  • सांस्कृतिक विकास: इनके शांतिपूर्ण शासनकाल के दौरान कन्नौज उत्तर भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र बन गया।

  • साहित्यिक संदर्भ: बाणभट्ट द्वारा रचित 'हर्षचरित' में इनकी अत्यधिक प्रशंसा की गई है।

7. गृह-वर्मा (लगभग 605 – 606 ईस्वी)

  • वंश: यह अवंति-वर्मा के बड़े पुत्र थे।

  • प्रसिद्ध विवाह: इनका विवाह थानेश्वर के पुष्यभूति (वर्धन) वंश के राजा प्रभाकरवर्धन की पुत्री राज्यश्री से हुआ था। यह उत्तर-गुप्तों और गौड़ शासकों का मुकाबला करने के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक गठबंधन था।

  • दुखद अंत: मालवा के उत्तर-गुप्त शासक देवगुप्त ने गौड़ नरेश शशांक के साथ मिलकर कन्नौज पर आक्रमण किया और युद्ध में गृह-वर्मा की हत्या कर दी

  • ऐतिहासिक प्रभाव: इनकी हत्या के बाद राज्यश्री को बंदी बना लिया गया, जिसके कारण उनके भाइयों (राज्यवर्धन और हर्षवर्धन) को सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ा। अंततः कन्नौज का विलय हर्ष के साम्राज्य में हो गया।


📌 प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण अभिलेख और साहित्यिक स्रोत

स्रोत का नाम

संबंधित शासक

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

हराहा अभिलेख (554 ईस्वी)

ईशान-वर्मा

'महाराजाधिराज' की उपाधि और हूणों/गौड़ों पर विजय की पुष्टि करता है।

असीरगढ़ ताम्र मुद्रा

सर्व-वर्मा

मौखरि वंश की प्रामाणिक वंशावली (Genealogy) प्रदान करता है।

जौनपुर अभिलेख

ईश्वर-वर्मा / ईशान-वर्मा

दक्षिण और पूर्वी राजाओं के विरुद्ध किए गए सैन्य अभियानों का विवरण देता है।

हर्षचरित (बाणभट्ट)

अवंति-वर्मा / गृह-वर्मा

थानेश्वर के साथ वैवाहिक संबंध और गृह-वर्मा के पतन की ऐतिहासिक जानकारी देता है।


✅ क्विक समरी 

कन्नौज के मौखरि शासकों का सही कालक्रम है: हरि-वर्मा → आदित्य-वर्मा → ईश्वर-वर्मा → ईशान-वर्मा (प्रथम स्वतंत्र शासक) → सर्व-वर्मा → अवंति-वर्मा → गृह-वर्मा (अंतिम शासक)

1. मौखरियों की 'जौनपुर शाखा' (The Jaunpur Branch)

मुख्य कन्नौज शाखा के अलावा मौखरियों की एक उप-शाखा भी थी, जो जौनपुर क्षेत्र में शासन करती थी। इनसे जुड़े तथ्य:

  • यज्ञ-यूप अभिलेख (Barva Inscription): राजस्थान के कोटाह (Barva) से मौखरि राजाओं के यूप अभिलेख मिले हैं, जिससे पता चलता है कि इनका अस्तित्व तीसरी सदी ईस्वी में भी था।

  • शासकों के नाम: इस शाखा में यज्ञवर्मा, शार्दूलवर्मा और अनंतवर्मा जैसे राजा हुए।

  • बराबर और नागार्जुन गुफा अभिलेख: इन राजाओं के अभिलेख गया (बिहार) के पास बराबर और नागार्जुन पहाड़ियों की गुफाओं में खुदे मिले हैं, जहाँ इन्होंने शैव धर्म से प्रभावित होकर गुफाएं दान की थीं।

2. मौखरियों की उत्पत्ति और धर्म (Origin & Religion)

  • उत्पत्ति: बाणभट्ट के हर्षचरित और अन्य स्रोतों के अनुसार, मौखरि वंश का संबंध 'अश्वपति' (वैवस्वत मनु के पुत्र) से जोड़ा गया है। इन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय माना जाता है।

  • मुद्रा शास्त्र (Numismatics): मौखरि राजाओं के सिक्कों पर 'मयूर' (Peacock) की आकृति बनी होती थी, जो गुप्तों के बाद कार्तिकेय और शिव के प्रति उनकी निष्ठा दिखाती है।

  • धर्म: यह राजवंश कट्टर शैव (Shaivite) था। इन्होंने बड़े पैमाने पर वैदिक यज्ञ (जैसे अग्निष्टोम यज्ञ) करवाए थे।

3. कन्नौज का 'बड़वा' (Barva) अभिलेखीय प्रमाण

  • मौखरि शब्द का सबसे प्राचीन उल्लेख एक मिट्टी की मुहर (Clay Seal) पर मिलता है, जो गया से प्राप्त हुई थी और इस पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में 'मोखलिनं' (Mokhalinam) लिखा है। यह साबित करता है कि यह वंश मौर्य काल जितना पुराना था, लेकिन इन्हें प्रसिद्धि छठी शताब्दी में कन्नौज में आकर मिली।


✅ एग्जाम के लिए फाइनल चेकलिस्ट (Quick Revision)

  • प्रथम राजा जिसने सिक्के जारी किए: ईशान-वर्मा (कन्नौज शाखा में)।

  • राजधानी: शुरुआत में संभवतः अयोध्या/गाजीपुर क्षेत्र, लेकिन मुख्य राजधानी कन्नौज (Kanyakubja) थी।

  • त्रिकोणीय संघर्ष की नींव: पाल-प्रतिहार-राष्ट्रकूट के त्रिकोणीय संघर्ष (Tripartite Struggle) से सदियों पहले, कन्नौज को भारत का राजनीतिक केंद्र बनाने का श्रेय मौखरियों को ही जाता है।



1. अभिलेखीय साक्ष्य और विशिष्ट तथ्य (Advanced Inscriptions & Facts)

परीक्षाओं में मिलान करने (Matching) के लिए इन अभिलेखों के नाम और उनमें लिखे गहरे तथ्य पूछे जाते हैं:

  • बड़वा यूप अभिलेख (Barwa Yupa Inscriptions, 237 ईस्वी): यह राजस्थान के कोटा (बड़वा) से मिला है। इसमें 'मोखरि' (Mokhari) शब्द का प्रारंभिक उल्लेख है। इसके तहत बलवर्धन, सोमदेव, और बलसिंह नामक तीन भाइयों द्वारा 'त्रिरात्र यज्ञ' (Triratra Sacrifice) कराए जाने का साक्ष्य मिलता है। 

  • गया मृणमुद्रा (Gaya Clay Seal): मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में अंकित यह मुहर मौखरियों का सबसे प्राचीन पुरालेखीय प्रमाण है, जिस पर 'मोखलिनं' (Mokhalinam) उत्कीर्ण है। 

  • हराहा अभिलेख (Haraha Inscription, 554 ईस्वी) का गहरा सच: इसमें ईशान-वर्मा को 'सूर्यान्वय' (सूर्यवंश) का बताया गया है और उनकी उत्पत्ति महाभारत के मद्र नरेश अश्वपति के 100 पुत्रों से जोड़ी गई है। इसी अभिलेख में कलयुग के प्रभाव को रोकने और वर्णाश्रम धर्म को पुनर्स्थापित करने का दावा किया गया है। 

  • जौनपुर का खंडित शिलालेख: इसमें ईश्वर-वर्मा या ईशान-वर्मा द्वारा विंध्य पर्वत के राजाओं और धारा नगरी (मालवा) पर विजय अभियानों का धुंधला विवरण मिलता है।

  • चन्द्रवल्ली अभिलेख (Chandravalli Inscription): यह कर्नाटक से मिला है। इससे यह संकेत मिलता है कि मौखरियों की एक छोटी शाखा सुदूर दक्षिण (कर्नाटक के पुन्नाट क्षेत्र) में भी मौजूद थी। 


2. मौखरियों की गया शाखा (The Gaya Branch of Maukharis)

प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर इस शाखा के राजाओं का कालक्रम कन्नौज शाखा के साथ मिलाकर उलझाया जाता है। यह शाखा बिहार के गया क्षेत्र (मगध) में सामंत के रूप में सक्रिय थी:

  • राजाओं का सही कालक्रम: यज्ञवर्मा → शार्दूलवर्मा → अनंतवर्मा

  • बराबर और नागार्जुन गुफाएं: इन राजाओं ने गया की इन पहाड़ियों की गुफाओं में मां कात्यायनी (दुर्गा), अनंतशायी विष्णु, और शिव (प्रवरगिरि) की मूर्तियों की स्थापना करवाई और ब्राह्मणों को गाँव दान में दिए。 

  • विशिष्ट उपाधि: शार्दूलवर्मा को अभिलेखों में 'सामंत-चूड़ामणि' कहा गया है।


3. मुद्राशास्त्र और आर्थिक इतिहास (Coins & Numismatics)

  • सिक्कों की धातु: मौखरियों ने मुख्यतः चांदी (Silver) और तांबे (Copper) के सिक्के जारी किए। स्वर्ण मुद्राएं (Gold Coins) इनके शासनकाल में अत्यंत दुर्लभ या न के बराबर थीं।

  • सिक्कों की शैली: इनके सिक्के गुप्त शैली (Gupta Style) और हूण राजा तोरमाण के सिक्कों की शैली की नकल थे। सिक्कों के अग्रभाग (Obverse) पर राजा का सिर और राजा का नाम छपा होता था।

  • मयूर (Peacock) आकृति: सिक्कों के पृष्ठभाग (Reverse) पर पंख फैलाए हुए मयूर (कार्तिकेय का वाहन) की आकृति बनी होती थी, जो गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के सिक्कों से प्रेरित थी।

  • सिक्के जारी करने वाले राजा: केवल ईशान-वर्मा, सर्व-वर्मा, और अवंति-वर्मा के नाम वाले सिक्के भारी मात्रा में मिले हैं। 

  • (Note: सामंत राजाओं के सिक्के नहीं मिले हैं)। 


4. प्रशासनिक शब्दावली (Administrative System)

मौखरियों का प्रशासनिक ढांचा गुप्त काल जैसा ही था, लेकिन कुछ विशेष पद परीक्षाओं में पूछे जाते हैं: 

  • सामंत व्यवस्था: मौखरि प्रशासन पूरी तरह से विकेंद्रीकृत और सामंती व्यवस्था पर आधारित था।

  • महासांधिविग्रहिक: युद्ध और शांति का मंत्री (विदेश मंत्री)।

  • महाबलाधिकृत: सेना का सर्वोच्च कमांडर (सेनापति)।

  • राजस्थानीय: प्रांतों या भुक्तियों के गवर्नर (राज्यपाल) को 'राजस्थानीय' या 'उपरिक' कहा जाता था।

  • सैन्य टुकड़ी: मौखरियों की सेना में गज सेना (Elephants) को सबसे मजबूत और घातक माना जाता था। ईशान-वर्मा ने हूणों को अपनी इसी हस्ति-सेना के दम पर कुचला था। 


5. सामाजिक-धार्मिक स्थिति और संस्कृति (Society, Religion & Literature)

  • वर्णाश्रम धर्म के रक्षक: ये राजा कट्टर रूढ़िवादी हिंदू (Orthodox Hindus) थे। समाज में बौद्ध और जैन धर्म के उभार के बाद इन्होंने ब्राह्मणवादी वर्णाश्रम व्यवस्था को दोबारा कठोरता से लागू किया। 

  • धार्मिक सहिष्णुता: कट्टर हिंदू होने के बावजूद इन्होंने बौद्ध धर्म को प्रताड़ित नहीं किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) के अनुसार, इनके समय कन्नौज में हिंदू मंदिरों के साथ-साथ कई बौद्ध विहार भी फल-फूल रहे थे। 

  • साहित्यिक संरक्षण:

    • बाणभट्ट ने हर्षचरित में कन्नौज की समृद्धि की तुलना इंद्र की नगरी से की है।

    • कुछ विद्वानों के अनुसार, प्रसिद्ध नाटककार विशाखदत्त (जिन्होंने मुद्राराक्षस और देवीचन्द्रगुप्तम लिखा) संभवतः मौखरियों के समकालीन या उनके प्रभाव क्षेत्र से जुड़े थे।


6. वंश का अंत: शशांक और देवगुप्त का त्रिकोणीय गठजोड़

  • कन्नौज का घेराव: मालवा के उत्तर-गुप्त राजा देवगुप्त और बंगाल के गौड़ राजा शशांक ने मिलकर एक गुप्त संधि की थी।

  • विश्वासघात: जब गृह-वर्मा की हत्या हुई, तो राज्यश्री को कन्नौज के कारागार में लोहे की बेड़ियों से बांधकर रखा गया था।

  • थानेश्वर का प्रवेश: राज्यश्री को छुड़ाने के लिए उनके बड़े भाई राज्यवर्धन आए, जिन्होंने देवगुप्त को तो हरा दिया, लेकिन गौड़ नरेश शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

  • अंतिम विलय: इसके बाद हर्षवर्धन (Harsha) ने गद्दी संभाली, शशांक को पीछे धकेला, अपनी बहन राज्यश्री को सती होने से बचाया और कन्नौज की मंत्रियों की परिषद (जिसके प्रमुख महानिदेशक बाणी थे) की सहमति से थानेश्वर और कन्नौज दोनों राज्यों को मिलाकर एक कर दिया। इस प्रकार मौखरि साम्राज्य का अस्तित्व आधिकारिक रूप से वर्धन साम्राज्य में विलीन हो गया। 


✅ एग्जाम हैक:

  • मौखरि वंश का आदिपुरुष (Progenitor): मुखर (Mukhara)।

  • प्रथम महाराजाधिराज: ईशान-वर्मा।

  • साम्राज्य की सीमाएं: पूर्व में मगध (बिहार) से लेकर पश्चिम में कुरुक्षेत्र (पंजाब सीमा) और दक्षिण में बुंदेलखंड तक।

  • पतन का मुख्य कारण: उत्तर-गुप्त (Later Guptas) राजाओं से पीढ़ियों पुरानी दुश्मनी और गौड़ शासक शशांक का धोखा।


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