एक पंथ दो काज: बाल कहानी | Ek Panth Do Kaaj Hindi Story
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एक पंथ दो काज
मनसा कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करता था, इसलिए मिट्टी ढोने के लिए उसने आठ-दस गधे पाल रखे थे। उसका एक लड़का था, जिसका नाम था राजू। राजू आठवीं कक्षा में पढ़ता था। वार्षिक परीक्षा समाप्त हो चुकी थीं। उसका स्कूल जाना फिलहाल बंद था। उसे बाल भास्कर पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। उसके पास पिछले अनेक अंक जमा थे।
एक दिन राजू एक कहानी पढ़ रहा था। उसमें उसने एक मुहावरा पढ़ा, 'एक पंथ दो काज'। उसने चाक पर बर्तन बनाते अपने पिताजी से पूछा, "पिताजी, एक पंथ दो काज का क्या मतलब होता है?"
"अरे यह तो बड़ा आसान है। इसका मतलब है एक साथ दो काम करना।" पिताजी ने बताया। राजू फिर बोला- "कोई उदाहरण देकर बताइए न पिताजी।" उन्होंने बताया, "बेटा जैसे मैं चाक पर काम करते-करते मिट्टी के बर्तन खरीदने आने वाले ग्राहकों को बर्तन दिखाकर बेच देता हूं। ऐसे में काम का काम हो जाता है और दाम का दाम मिल जाता है।"
"क्या बात है पिताजी आपने तो मुहावरा समझाते हुए भी दूसरा मुहावरा बता दिया।" राजू ने मुस्कुराते हुए कहा।
तभी राजू की मां बोली, "राजू पढ़ाई करने के बाद इन गधों को जंगल की ओर ले जाना। कुछ देर हरी घास चर आएंगे। गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है, इसलिए खूंटे से बंधे-बंधे ये परेशान हो गए हैं।"
"मां मुझे इन पुस्तकों को पढ़ना है।" राजू ने कहा। "अरे पढ़ने से कौन रोक रहा है तुझे, इनको साथ ले जा और वहां पेड़ की छाया के नीचे बैठकर पढ़ लेना.. वहां तेरे आस-पास गधे भी चरते रहेंगे।" मां ने उसे समझाते हुए कहा।
इस बीच मनसा ने कहा, "राजू अभी मैंने तुझे कौन-सा मुहावरा समझाया था?" राजू तपाक से बोला- "पिताजी..एक पंथ दो काज।" इस पर उन्होंने कहा, "तेरी मां भी तो यही कह रही है कि गधों को चराते-चराते अपनी किताब भी पढ़ते रहना।" राजू मां-पिताजी की बात मानते हुए गधों को लेकर जंगल की ओर निकल गया।
उन गधों में एक गधा थोड़ा शरारती था। वह चरते-चरते इधर-उधर खेतों की तरफ चला जाता। फसल खराब न कर दे, इसलिए उस पर नजर रखना भी जरूरी था। राजू ने एक तरकीब निकाली, ताकि उसे पढ़ाई में रुकावट भी न आए और उस गधे पर भी निगरानी रहे।
वह अपनी मैगजीन लेकर गधे की पीठ पर बैठ गया। गधा चरता रहा और राजू अपनी बाल भास्कर पढ़ने लगा। उसकी पीठ पर बैठकर उसे मजा आने लगा। आते-जाते लोग जो उसे देखते तो कहते, 'बच्चा हो तो इसके जैसा मेहनती और लगनशील, ये तो एक पंथ दो काज कर रहा है यानी अपने समय का सदुपयोग भी कर रहा है और गधों की रखवाली भी। राजू अब तल्लीनता से बाल भास्कर का एक-एक पृष्ठ पढ़ रहा था और अपने ज्ञान में अभिवृद्धि कर रहा था।
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