हिंदी समास
समास तालिका:
| समास का नाम |
प्रधान पद |
| अव्ययीभाव समास |
पूर्वपद प्रधान |
| तत्पुरुष समास |
उत्तरपद प्रधान |
| कर्मधारय समास |
|
| द्विगु समास |
|
| द्वंद्व समास |
दोनों पद प्रधान |
| बहुव्रीहि समास |
दोनों पद अप्रधान (तीसरा अर्थ प्रधान) |
पास बिठाना
परिभाषा: समास शब्द दो शब्दों (सम् + आस) से मिलकर बना है।
शाब्दिक अर्थ: संक्षेप / संक्षेपीकरण।
समास का विलोम शब्द व्यास (कथावाचक) होता है।
दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन सार्थक शब्द समास कहलाता है।
समास में दो पद होते है: पूर्व पद (पहला) रसोई, उत्तरपद (दूसरा) घर। समास = रसोईघर।
समास विग्रह: सामासिक शब्दों के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करना समास विग्रह कहलाता है।
- रसोई के लिए घर (सम्प्रदान तत्पुरुष)
- गंगा का जल (सम्बन्ध तत्पुरुष)
नोट: हिंदी में समास 6 प्रकार के होते है।
मुख्य रूप से समास चार प्रकार के होते है।
कर्मधारय और द्विगु समास तत्पुरुष समास के अन्तर्गत आते है।
अव्ययीभाव समास
जिस समास में पूर्व पद प्रधान या अव्यय हो, अव्ययीभाव समास कहलाता है।
- अव्यय: (जिसका कुछ भी व्यय न हो)
- यह समास वाक्य में क्रिया विशेषण का कार्य करता है।
- ट्रिक: यथा, बे, बा, दर, भर, अनु, प्रति, आ, उप, नि, निर्
उदाहरण:
यथासमय = समय के अनुसार
आजीवन = जीवनभर
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
प्रत्युपकार = उपकार के प्रति
प्रत्यक्ष = अक्षि के सामने
अनुरूप = रूप के अनुसार
परोक्ष = अक्षि के परे
बेकाम = बिना काम के
प्रत्यंग = प्रत्येक अंग
बाकायदा = कायदे के अनुसार
अपादमस्तक = पैर से मस्तक तक
पूर्वपद और उत्तरपद समान हो:
सरासर = सर-आ-सर
घर-घर = घर ही घर
प्रत्येक = हरेक
बार-बार = बार ही बार
भरपेट = पेट भर कर
रातों-रात = रात ही रात
दरअसल = असल में
घड़ी-घड़ी = घड़ी ही घड़ी
उपकूल = कूल के समीप
दिनानुदिन = दिन ही दिन
बखूबी = खूबी के साथ
साफ-साफ = बिल्कुल साफ
निर्विवाद = बिना विवाद के
हाथों-हाथ = हाथ ही हाथ
पल-पल = पल ही पल
मुँह-आ-मुँह
आप ही आप
कही न कहीं
कुछ न कुछ
तत्पुरुष समास (हिंदी समास #2)
जिस समास में पूर्वपद गौण (नगण्य) तथा उत्तर पद प्रधान होता है, तत्पुरुष समास कहलाता है。
तत्पुरुष समास परसर्गों (कारक चिन्ह) के आधार पर 6 प्रकार का होता है।
(i) कर्म तत्पुरुष (द्वितीया तत्पुरुष): इसमें 'को' विभक्ति का लोप होता है।
ख्यातिप्राप्त = ख्याति को प्राप्त
मतदाता = मत को देने वाला
गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
मरणासन्न = मरने को आसन्न (निकट)
जेबकतरा = जेब को कतरने वाला
कठफोड़वा = काठ को फोड़ने वाला
चिड़िमार = चिड़िया को मारने वाला
यश प्राप्त = यश को प्राप्त
तिलकुटा = तिल को कूटकर बनाया हुआ
(ii) करण तत्पुरुष (तृतीया तत्पुरुष): इसमे 'से' या 'के द्वारा' विभक्ति का लोप होता है।
गोबर-गणेश = गोबर से निर्मित गणेश
रोगातुर = रोग से आतुर (व्याकुल)
अश्रुपूर्ण = अश्रु से पूर्ण
रसभरा = रस से भरा
रेलयात्रा = रेल के द्वारा यात्रा
जन्मांध = जन्म से अन्धा
जन्मजात = जन्म से उत्पन्न
मुँहमाँगा = मुँह से मांगा
मनचाहा = मन से चाहा हुआ
दोषपूर्ण = दोष से पूर्ण
तुलसीकृत = तुलसी के द्वारा रचित
रोगपीड़ित = रोग से पीड़ित
क्षुधातुर = क्षुधा (भूख) से आतुर (व्याकुल)
बैलगाड़ी = बैल से चलने वाली गाड़ी
वचनबद्ध = वचन से बद्ध
आतपजीवी = आतप (धूप) से जीने वाला
अकालपीड़ित = अकाल से पीड़ित
(iii) सम्प्रदान तत्पुरुष (चतुर्थी विभक्ति): इसमे 'के लिए' या 'के वास्ते' विभक्ति का लोप होता है
रसोईघर = रसोई के लिए घर
पुस्तकालय = पुस्तक के लिए आलय
हवनकुंड = हवन के लिए कुंड
मार्ग व्यय = मार्ग के लिए व्यय
यज्ञशाला = यज्ञ के लिए शाला
परीक्षाभवन = परीक्षा के लिए भवन
विधानसभा = विधान के लिए सभा
सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
मालगोदाम = माल के लिए गोदाम
युद्धभूमि = युद्ध के लिए भूमि
गुरुदक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
छात्रावास = छात्रों के लिए आवास
विद्यालय = विद्या के लिए आलय
न्यायालय = न्याय के लिए आलय
गोशाला = गो के लिए शाला
हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
(iv) अपादान तत्पुरुष (पंचमी तत्पुरुष): इसमें 'से' विभक्ति का लोप होता है, तथा अलग होने का भाव होता है।
ईश्वर विमुख = ईश्वर से विमुख
जलरिक्त = जल से रिक्त
बुद्धिहीन = बुद्धि से हीन
ग्रहणमुक्त = ग्रहण से मुक्त
रोग मुक्त = रोग से मुक्त
नेत्रहीन = नेत्र से हीन
धनहीन = धन से हीन
पापमुक्त = पाप से मुक्त
पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
देश निकाला = देश से निकाला
धर्म विमुख = धर्म से विमुख
विद्यारहित = विद्या से रहित
लोकोत्तर = लोक से परे
(v) सम्बन्ध तत्पुरुष (षष्ठी तत्पुरुष): इसमें का, की, के विभक्ति का लोप होता है।
गंगाजल = गंगा का जल
मातृभक्ति = माता की भक्ति
मातृहन्ता = माता की हत्या
पुष्पवर्षा = पुष्प की वर्षा
राजाज्ञा = राजा की आज्ञा
कन्यादान = कन्या का दान
घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
दीपावली = दीपों की अवली (पंक्ति)
गृहस्वामी = गृह का स्वामी
सेनाध्यक्ष = सेना का अध्यक्ष
सेनानायक = सेना का नायक
भारतरत्न = भारत का रत्न
राजपुत्र = राजा का पुत्र
दिनचर्या = दिन की चर्या
राजनीति = राजा की नीति
विषवमन = विष का वमन
सुरवृन्द = सुरों का वृंद (समूह)
चन्द्रोदय = चन्द्र का उदय
(vi) अधिकरण तत्पुरुष (सप्तमी तत्पुरुष): इसमें में, पर विभक्ति का लोप होता है।
दानवीर = दान में वीर
आपबीती = आप पर बीती
नगर प्रवेश = नगर में प्रवेश
नीतिनिपुण = नीति में निपुण
घृतान्न = घी में पका अन्न
आनन्दमग्न = आनन्द में मग्न
ध्यानमग्न = ध्यान में मग्न
मुनिश्रेष्ठ = मुनियों में श्रेष्ठ
कविपुंगव = कवियों में पुंगव (श्रेष्ठ)
वनवास = वन मे वास
आत्मनिर्भर = आत्मा पर निर्भर
वाहनारूढ़ = वाहन पर आरुढ़ (सवार)
आत्मविश्वास = आत्मा पर विश्वास
घुड़सवार = घोड़े पर सवार
हरफनमौला = हरफन में मौला
ग्रामवास = ग्राम में वास
कुलश्रेष्ठ = कुल में श्रेष्ठ
नञ् तत्पुरुष:
जिस शब्द में 'न' के अर्थ में 'अ' या 'अन' का प्रयोग हो वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है।
अनन्त = न अन्त
अनपढ़ = न पढ़
असभ्य = न सभ्य
अधर्म = न धर्म
अचल = न चल
अकृतम् = न कृतम्
लुप्तपद तत्पुरुष समास:
रेलगाड़ी = पटरी पर चलने वाली गाड़ी
नोट: अलुक तत्पुरूष: जिस समास के पहले पद में विभक्ति का लोप न होकर उसी में समाहित रहती है।
- युधिष्ठिर = युद्ध में स्थिर रहने वाला
- मनसिज = मन में उत्पन्न
- वाचस्पति = वाक् का पति
- आत्मनेपद = स्वयं में उत्पन्न
समास # 4
अपवाद : उपपद तत्पुरुष समास
- दहीबड़ा = दही में भिगोया बड़ा
- पर्णकुटी = पत्तों से बनी कुटी
- जलकुंभी = जल में उत्पन्न होने वाला
कर्मधारय समास
जिस समास में पूर्वपद विशेषण और उत्तर पद विशेष्य होता है कर्मधारय समास कहलाता है。
इसमें उत्तर पद प्रधान होता है。
उदा: काला कपड़ा, विशेषण, संज्ञा (विशेष्य)
देहलता = देह रुपी लता
लालमणि = लाल है जो मणि
कमलनयन = कमल के समान नयन
कनकलता = कनक रुपी लता
लौहपुरुष = लौह के समान पुरुष
परमेश्वर = परम है जो ईश्वर
चन्द्रमुखी = चन्द्र के समान मुख वाली
चरणकमल = कमल के समान चरण
महाकवि = महान है जो कवि
सद्धर्म = सत् है जो धर्म
सज्जन = सत् है जो जन
प्रियसखा = प्रिय है जो सखा
वचनामृत = वचन रुपी अमृत
अधपका = आधा है जो पका
अधमरा = आधा है जो मरा
नीलगाय = नीली है जो गाय
नीलोत्पल = नीला है जो उत्पल
वायुवेग = वायु के समान वेग
कीर्तिलता = कीर्ति रूपी लता
काली मिर्च = काली है जो मिर्च
संसार सागर = संसार रुपी सागर
सद्भावना = सत् है जो भावना
कापुरुष = कायर है जो पुरुष
कृताकृत = किया-बेकिया
प्राणधन = प्राण रुपी धन
सुवर = सुन्दर है जो वर
गुरुदेव = गुरु रुपी देव
अपवाद:
कुछ ऐसे शब्द जिसमे विशेषण और विशेष्य के साथ तीसरे अर्थ की भी प्रधानता हो। (बहुव्रीहि, कर्मधारय)
महावीर = महान है जो वीर
नीलकंठ = नीला है जो कंठ
पीताम्बर = पीत है जो अम्बर
महात्मा = महान है जो आत्मा
श्वेताम्बर = श्वेत है जो अम्बर
घनश्याम = घन रुपी श्याम
द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची हो तथा उत्तर पद प्रधान हो द्विगु समास कहलाता है।
उदा:
पंसेरी = पाँच सेरों का समूह
चौराहा = चार राहों का समूह
चवन्नी = चार आनों का समूह
अठन्नी = आठ आनों का समूह
सप्तशती = सात सैकड़ों का समूह
नवरत्न = नौ रत्नों का समूह
नवरात्र = नौ रात्रियों का समूह
अष्टाध्यायी = आठ अध्यायों का समूह
दोपहर = दो पहरों का समूह
पंचवटी = पाँच वटों का समूह
तिरंगा = तीन रंगो का समूह
सप्ताह = सात दिनों का समूह
सप्तमंजिल = सात मंजिलों का समूह
सप्तदीप = सात दीपों का समूह
सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह
तिकोना = तीन कोनो का समूह
चौलड़ी = चार लड़ियों का समूह
त्रिभुवन = तीन भवनों का समूह
सतसई = सात सौ दोहों का समूह
अपवाद:
त्रिनेत्र = तीन नेत्रों का समूह
त्रिदेव = तीन देवों का समूह
दशानन = दस आननों का समूह
पंचानन = पाँच आननों का समूह
षडानन = 6 आननों का समूह
चतुर्भुज = चार भुजाओं का समूह
चतुरानन = चार आननों का समूह
त्रिलोचन = तीन लोचनों का समूह
द्वंद्व समास
जिस समास में दोनों पद प्रधान होते है तथा दोनों का स्वतन्त्र अस्तित्व होता है। उसे द्वंद्व समास कहते हैं。
पहचान: शब्द के मध्य में योजक चिह्न एवं विपरीतार्थी शब्द
समास के तीन भेद होते है-
(i) इतरेतर : इसके मध्य में 'और' का लोप होता है।
भाई-बहन = भाई और बहन
सीता-राम = सीता और राम
अड़सठ = आठ और साठ
अमीर-गरीब = अमीर और गरीब
लव-कुश = लव और कुश
माँ-बाप = माँ और बाप
तन-मन-धन = तन और मन और धन
राधा-कृष्ण = राधा और कृष्ण
देवासुर = देव और असुर
कृष्णार्जुन = कृष्ण और अर्जुन
धर्माधर्म = धर्म और अधर्म
चराचर = चर और अचर
पच्चीस = पाँच और बीस
भूख-प्यास = भूख और प्यास
सुख-दुःख = सुख और दुःख
दिन-रात = दिन और रात
समास # 5
(ii) समाहार द्वंद्व : समूह (दोनों पद प्रधान)
अन्न-जल = अन्न और जल
चाय-पानी = चाय और पानी
दाल-रोटी = दाल और रोटी
कपड़ा-लत्ता = कपड़ा और लत्ता
धन-दौलत = धन और दौलत
फल-फूल = फल और फूल
(iii) वैकल्पिक : इसमें विकल्प का बोध होता है
आज-कल = आज या कल
पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
ठण्डा-गर्म = ठण्डा या गर्म
भला-बुरा = भला या बुरा
थोड़ा-बहुत = थोड़ा या बहुत
न्यूनाधिक = न्यून या अधिक
बहुव्रीहि समास
जिस समास में दोनों पद अप्रधान हों तथा दो पदों के माध्यम से तीसरे अर्थ का बोध होता है, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है।
श्वेताम्बर = श्वेत है वस्त्र जिनके (सरस्वती)
चतुर्भुज = चार भुजाएँ है जिसकी (विष्णु/ब्रह्मा)
प्रधानमंत्री = मंत्रियों में प्रधान है जो (विशेष व्यक्ति)
दशानन = दस आनन है जिसके (रावण)
सपरिवार = परिवार के साथ है जो (विशेष)
पंचानन = पाँच आनन है जिसके (शिव/हनुमान)
चक्रपाणि = चक्र है हाथ में जिसके (विष्णु)
षडानन = 6 आनन है जिसके (कार्तिकेय)
लम्बोदर = लम्बा है उदर जिसके (गणेश)
नीलकण्ठ = नीला है कण्ठ जिसका (शिव)
महावीर = महान है वीर जो (हनुमान)
मृत्युंजय = मृत्यु को जीतने वाला (शिव)
पीताम्बर = पीले हैं वस्त्र जिसके (श्रीकृष्ण)
हृषीकेश = हृषीक के ईश हैं जो (विष्णु/कृष्ण)
चन्द्रशेखर = चन्द्र है जिसके शिखर पर (शिव)
चन्द्रचूड़ = चन्द्र है जिसके चूड़ पर (शिव)
गजानन = गज के जैसा मुख (गणेश)
पंकज = पंक (कीचड़) में उत्पन्न (कमल)
जलज = जल में उत्पन्न (कमल)
गिरिधर = गिरि को धारण करने वाले (श्रीकृष्ण)
अंशुमाली = अंशु (किरण) है माला जिसकी (सूर्य)
कनफटा = कान हैं फटा जिसका (नाथ सन्त)
शाखामृग = शाखाओं पर विचरण करने वाला (वानर)
सहस्राक्ष = हजार आँखों वाला (इन्द्रदेव)
अपवाद :
- मुक्का-मुक्की
- बाताबाती
- गाली-गलौच
- लाठा-लाठी