Solution for SCERT up board कार्यपुस्तिका (वर्कबुक) कक्षा 5 वाटिका पाठ 14 सरदार भक्ति - नीति माधुरी हिन्दी Class 5 solution hindi pdf.
Class 5 "Vatika" Chapter 13 Workbook Solution Bhakti Niti Madhuri,
भक्ति नीति माधुरी (Bhakti-Niti Madhuri)
यहाँ मीराबाई, तुलसीदास जी और रसखान के पदों की प्रत्येक पंक्ति और उसका सरल अर्थ नीचे दिया गया है:
1. मीराबाई (भक्ति-नीति माधुरी)
पंक्ति: बसी मोरे नैनन में नन्दलाल।
अर्थ: मीराबाई कहती हैं कि हे नंदलाल (श्री कृष्ण)! आप सदैव मेरी आँखों में बसे रहिए।
पंक्ति: मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, अरुन तिलक दिये भाल।
अर्थ: आपके सिर पर मोर के पंखों का मुकुट है, कानों में मछली के आकार के कुंडल (मकराकृत) हैं और मस्तक पर लाल रंग (अरुन) का तिलक सुशोभित है।
पंक्ति: मोहनि मूरति साँवरी सूरति, नैना बने विसाल।
अर्थ: आपकी सांवली सूरत मन को मोहने वाली है और आपकी बड़ी-बड़ी आँखें (विशाल नैन) अत्यंत सुंदर लग रही हैं।
पंक्ति: अधर-सुधा-रस मुरली राजत, उर वैजन्ती माल।।
अर्थ: आपके अमृत रूपी रस से भरे होठों पर बाँसुरी शोभा पा रही है और आपके हृदय (छाती) पर वैजयंती फूलों की माला सुशोभित है।
पंक्ति: छुद्र घण्टिका कटि-तट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
अर्थ: आपकी कमर में बंधी करधनी में छोटी-छोटी घंटियाँ सुशोभित हैं और पैरों के घुँघरुओं (नूपुर) की आवाज़ बहुत ही मधुर और रसीली प्रतीत होती है।
पंक्ति: मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।।
अर्थ: मीराबाई कहती हैं कि मेरे प्रभु श्री कृष्ण संतों को सुख देने वाले और अपने भक्तों से अत्यधिक प्रेम करने वाले (भक्त वत्सल) हैं।
2. तुलसीदास (दोहावली/रामचरितमानस से)
पंक्ति: का बरषा जब कृषी सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने ।।1।।
अर्थ: उस वर्षा का क्या लाभ जब पूरी खेती ही सूख चुकी हो? इसी प्रकार, यदि सही समय बीत जाए, तो उसके बाद पछताने से कोई फायदा नहीं होता।
पंक्ति: पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।।2।।
अर्थ: दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत से लोग कुशल (होशियार) होते हैं, लेकिन उस उपदेश को खुद के जीवन में आचरण (अमल) में लाने वाले लोग बहुत कम होते हैं।
पंक्ति: कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव-दैव आलसी पुकारा ।।3।।
अर्थ: कायर (कमज़ोर) मन वाले लोगों का केवल एक ही सहारा होता है—भाग्य। आलसी लोग हमेशा काम न करके 'भाग्य-भाग्य' (किस्मत) ही चिल्लाते रहते हैं।
पंक्ति: हित अनहित पसु पछिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान-निधाना ।।4।।
अर्थ: अपना भला (हित) और बुरा (अनहित) तो पशु और पक्षी भी समझ जाते हैं, लेकिन मनुष्य का शरीर तो सद्गुणों और ज्ञान का खजाना (भंडार) है, उसे तो और भी बेहतर समझना चाहिए।
पंक्ति: जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना। जहाँ कुमति तहँ विपति निधाना ।।5।।
अर्थ: जहाँ अच्छी बुद्धि (सुमति) और एकता होती है, वहाँ तरह-तरह की सुख-सम्पत्ति आती है। इसके विपरीत, जहाँ दुर्बुद्धि (कुमति) होती है, वहाँ केवल विपत्तियों और दुखों का वास होता है।
पंक्ति: परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।6।।
अर्थ: हे भाई! दूसरों की भलाई (परहित) करने के समान कोई बड़ा धर्म नहीं है, और दूसरों को दुःख (पीड़ा) पहुँचाने के समान कोई दूसरा बड़ा पाप या नीचता (अधमाई) नहीं है।
यहाँ रसखान कवि के दोनों सवैयों की प्रत्येक पंक्ति और उसका सरल अर्थ नीचे दिया गया है:
पहला सवैया (श्रीकृष्ण के बाल रूप का वर्णन)
पंक्ति 1: धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
अर्थ: धूल से सने हुए बालक श्रीकृष्ण अत्यधिक सुंदर लग रहे हैं और वैसी ही उनके सिर पर सुंदर चोटी सुशोभित हो रही है।
पंक्ति 2: खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछौटी।
अर्थ: वे अपने घर के आँगन में खाते और खेलते हुए घूम रहे हैं, उनके पैरों में पायल (पैंजनी) बज रही है और उन्होंने पीले रंग की लंगोटी (धोती) पहनी हुई है।
पंक्ति 3: वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी।
अर्थ: श्रीकृष्ण के इस अनुपम सौंदर्य को देखकर कवि रसखान कहते हैं कि कामदेव भी उनके इस रूप पर अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर कर देते हैं।
पंक्ति 4: काग के भाग बड़े सजनी, हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी।
अर्थ: एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सजनी! उस कौए के भाग्य कितने बड़े हैं, जो स्वयं भगवान (श्रीकृष्ण) के हाथ से माखन और रोटी छीनकर ले गया।
दूसरा सवैया (ब्रज भूमि के प्रति प्रेम)
पंक्ति 1: या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
अर्थ: रसखान कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण की इस लाठी (लकुटी) और कंबल (कामरिया) के लिए मैं तीनों लोकों के राज्य को भी त्यागने के लिए तैयार हूँ।
पंक्ति 2: आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख, नन्द की गाय चराय बिसारौं।।
अर्थ: यदि मुझे नंद बाबा की गायों को चराने का अवसर मिले, तो मैं उस सुख के सामने आठों सिद्धियों और नौ निधियों से मिलने वाले सुखों को भी भुला सकता हूँ।
पंक्ति 3: नैनन ते रसखानि जबै, ब्रज के बन-बाग तड़ाग निहारौं।
अर्थ: रसखान कहते हैं कि जब से मेरी आँखों ने ब्रज के वनों, बगीचों और तालाबों (तड़ाग) को देखा है (तब से मन वहीं रम गया है)।
पंक्ति 4: कोटिक ये कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं।।
अर्थ: ब्रज की इन काँटेदार झाड़ियों (करील के कुंजों) में रहने के आनंद के सामने मैं सोने के करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) को भी न्योछावर करने को तैयार हूँ।
Up Board Solutions Class 5
भक्ति नीति माधुरी : कक्षा 5 हिन्दी पाठ 14
Solution for SCERT up board पाठ्यपुस्तक कक्षा 5 वाटिका पाठ 14 सरदार भक्ति - नीति माधुरी हिन्दी Class 5 solution hindi pdf. Class 5 "Vatika" Chapter 13 textbook Solution Bhakti Niti Madhuri,
भक्ति नीति माधुरी (Bhakti-Niti Madhuri)
Solution for SCERT up board textbook कक्षा 5 ( वाटिका ) भक्ति नीति माधुरी : कक्षा 5 हिन्दी पाठ 14 हिन्दी Class 5 solution hindi pdf. Class 5 "Vatika" Chapter 14 Bhakti,
यह अभ्यास प्रश्नोत्तर कक्षा 5 की हिंदी पाठ्यपुस्तक "वाटिका-5" के भक्ति नीति माधुरी : कक्षा 5 हिन्दी पाठ 14 वाले पाठ से लिए गए हैं।
Exercise ( अभ्यास )
यह कक्षा 5 की हिंदी वाटिका (UP Board) का पृष्ठ है।
नीचे इस पृष्ठ पर दिए गए सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर (हल) दिए गए हैं:
1. बोध प्रश्न : उत्तर लिखिए –
(क) मीरा ने कृष्ण के किन गुणों का बखान किया है?
उत्तर: मीरा ने कृष्ण के भक्त-वत्सल (भक्तों से प्रेम करने वाले), कृपालु और संतों को सुख देने वाले गुणों का बखान किया है।
(ख) तुलसीदास ने सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा अधर्म किसे बताया है?
उत्तर: तुलसीदास जी ने परहित (दूसरों की भलाई करना) को सबसे बड़ा धर्म और परपीड़ा (दूसरों को कष्ट पहुँचाना) को सबसे बड़ा अधर्म बताया है।
(ग) रसखान ने तीनों लोकों का राज्य किस बात पर न्योछावर करने को कहा है?
उत्तर: रसखान ने कृष्ण की लाठी (लकुटी) और कंबल (कामरिया) पर तीनों लोकों का राज्य न्योछावर करने को कहा है।
(घ) रसखान ने कौवे को भाग्यशाली क्यों कहा है?
उत्तर: रसखान ने कौवे को भाग्यशाली इसलिए कहा है क्योंकि उस कौवे को श्री कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी छीनकर खाने का सौभाग्य मिला।
(ङ) रसखान ने कृष्ण की कैसी छवि का वर्णन किया है?
उत्तर: रसखान ने धूल से सने हुए, सिर पर सुंदर चोटी धारण किए हुए और पैरों में पैंजनी बजाते हुए आँगन में खेलते हुए कृष्ण की अत्यंत मनमोहक बाल-छवि का वर्णन किया है।
2. नीचे लिखी काव्य पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) 'काग के भाग बड़े सजनी, हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी।'
भाव: हे सखी! उस कौवे के भाग्य की जितनी सराहना की जाए कम है, जो साक्षात भगवान कृष्ण के हाथों से माखन और रोटी छीनकर ले गया।
(ख) 'कोटिक ये कलधौत के धाम, करील की कुंजन ऊपर वारौं।'
भाव: रसखान जी कहते हैं कि वे ब्रज की काँटेदार झाड़ियों (करील के कुंजों) के सुख के सामने सोने-चांदी के करोड़ों महलों के सुख को भी न्योछावर करने के लिए तैयार हैं।
(ग) समय चूकि पुनि का पछिताने।
भाव: सही समय बीत जाने या अवसर हाथ से निकल जाने के बाद पछतावा करने से कोई लाभ नहीं होता है।
(घ) जहाँ कुमति तहँ बिपति निधाना।
भाव: जहाँ पर दुर्बुद्धि (बुरी सोच) होती है, वहाँ कष्ट और विपत्तियों का वास होता है।
(ङ) मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।
भाव: मीराबाई कहती हैं कि उनके प्रभु श्री कृष्ण संतों को सुख देने वाले और अपने भक्तों से अगाध प्रेम करने वाले हैं।
3. सोच-विचार : बताइए –
आप ऐसे लोगों को कौन-सा दोहा सुनाएँगे –
जो अपना काम समय पर नहीं करते और बाद में पछताते हैं।
दोहा: "समय चूकि पुनि का पछिताने, का बरखा जब कृषी सुखाने।"
जो आलसी हैं।
दोहा: "अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥"
जो स्वयं नहीं करते, किंतु दूसरों को उपदेश देते रहते हैं।
दोहा: "पर उपदेस कुसल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।"
जो दूसरों को कष्ट पहुँचाते रहते हैं।
दोहा: "परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।"
भाषा के रंग –
(क) 'बरखा' तद्भव शब्द है जिसका तत्सम रूप 'वर्षा' है। इसी प्रकार नीचे लिखे तद्भव शब्दों के तत्सम रूप को कोष्ठक से छाँटकर लिखिए – (कोष्ठक में दिए गए शब्द: कुशल, कायर, धर्म, भाग्य, श्याम, मक्खन, आधार, धूलि)
- धरम = धर्म
- धूरि = धूलि
- भाग = भाग्य
- साँवल = श्याम
- माखन = मक्खन
- आसरु = आधार
1. तद्भव - तत्सम शब्द
दी गई तालिका में तद्भव शब्दों के सामने उनके सही तत्सम रूप लिखिए:
| तद्भव |
तत्सम |
| कादर | कातर |
| धरम | धर्म |
| भाग | भाग्य |
| धूरि | धूलि |
| स्याम | श्याम |
| अधारा | आधार |
| माखन | मक्खन |
| कुसल | कुशल |
(ख) अधूरी पंक्तियों को पूरा कीजिए -
का बरषा जब कृषी सुखाने।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
5. अब करने की बारी
(क) पता करें - कृष्ण के बाल रूप का वर्णन और किन-किन कवियों ने किया है।
उत्तर: श्रीकृष्ण के बाल रूप का सुंदर और मनमोहक वर्णन मुख्य रूप से सूरदास, रसखान, तुलसीदास और मीराबाई जैसे महान कवियों ने किया है।
6. मेरे दो प्रश्न : पाठ के आधार पर दो सवाल बनाइए -
- प्रश्न 1: गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा अधर्म क्या है?
- प्रश्न 2: कुमति (बुरी बुद्धि) का क्या परिणाम होता है?
7. इस पाठ से -
(क) मैंने सीखा - हमें हमेशा दूसरों की भलाई करनी चाहिए क्योंकि परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है। इसके अलावा, अच्छी बुद्धि (सुमति) से घर में सुख-संपत्ति आती है।
(ख) मैं करूँगी/करूँगा - मैं कभी किसी को दुःख नहीं पहुँचाऊँगा/पहुँचाऊँगी और हमेशा दूसरों की सहायता करने का प्रयास करूँगा/करूँगी।